फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की एक नज़्म है – ‘कुत्ते’ - ‘ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते, कि बख़्शा गया जिनको ज़ौक़-ए-गदाई (भीख मांगने की तमन्ना) ज़माने की फटकार सरमाया (पूंजी) इनका, जहां भर की दुत्कार इनकी कमाई.’ फ़ैज़ इस नज़्म में कुत्तों को इशारा बनाकर मज़लूम इंसान की बात कह गए हैं. या यूं कहिए कि ‘सर्वहारा कुत्तों’ का दर्द बयां कर गए हैं. मैं जिसकी बात कर रहा हूं वो सर्वहारा नहीं है नाही वो कुत्ता सब तरफ़ से हारा है। ये वो कुत्ते हैं जो चकाचक हैं, जिनकी आम आदमी से ज़्यादा ऐश है।
सुबह टहलने भी जाता हूं तो एक अबूझ पहेली मेरे पीछे पड़ी रहती है। हम ‘कुत्ता’ शब्द को गाली के तौर पर क्यों इस्तेमाल करते हैं। उसकी तो बड़ी प्रतिष्ठा है। रौब है। वर्गीय चरित्र में मुझसे ऊपर है। मेरा बचपन मोहल्ले के ‘सर्वहारा’ कुत्तों के साथ बीता। बनारस के मोहल्ले से नोएडा की कॉलोनी में पहुंचा तो ‘बुर्जुआ कुत्तों’ से मेल जोल बढ़ा। यह फर्क मोहल्लों और कॉलोनी का था। इनकी एकदम बदली दुनिया देखी। सुबह जिस रास्ते मैं टहलने निकलता हूं उनमें कुत्तों के ढ़ेर सारे क्लिनिक हैं। जहां सिर्फ ‘पप्पीज’ का इलाज होता है। लम्बी विदेशी और लाल नीली बत्तीयों वाली सरकारी गाड़ी में इलाज के लिए बुर्जुआ कुत्ते आते हैं। रौब से उतरते हैं। साथ में सेवादार रहते हैं। और उनके साथ होती हैं बड़े पर्स वाली मेम।
इन क्लिनिक में सिर्फ इलाज और निरोग रहने के टीके ही नहीं मिलते यहां। कुत्तों के ब्राण्डेड विदेशी भोजन। डिजाइनर कपड़े। महंगी एक्ससरीज। पार्लर में बनाव श्रृंगार। उनके बाल रंगने की व्यवस्था। महंगे बिस्तर सब मिलते हैं। उनके लिए वे सारे इंतजाम हैं जो कुछ साल पहले तक मध्यवर्गीय परिवार के सपने हुआ करते थे। इस ‘इंडिया’ में इन सुविधाओं का मजा कुत्ते ले रहे हैं। ब्रिटेन में कुत्तों के लिए फाइव स्टार होटल खुला है। वजनदार कुत्तों के लिए लिफ्ट बनायी गयी है। जापान में मनुष्यों की जन्म दर घटी है। पर कुत्तों की बढ़ी है। हो सकता है जापान आने वाले कुछ दिनों में कुत्ते बिल्लियों का ‘सुपरपॉवर’ बन जाए।
मेरे घर में भी दो कुत्ते हैं। एक ‘डैसहाउण्ड’ और दूसरा ‘पग’। ‘डैसहाउण्ड’ की नस्ल को हिटलर ने तैयार किया था। इन दोनों कुत्तों का घर में ख़ूब जलवा है। इनके भोजन और सुख सुविधाओं का ध्यान मुझसे ज्यादा रखा जाता है। इस जलन में मेरा मन भी कभी-कभी कुत्ता बनने का करने लगता है। मेरी एक अंग्रेजनुमा पड़ोसन ने एक रोज मुझसे पूछा। ‘आपके यहां कितने कुत्ते हैं’। मैंने कहा ‘मुझे मिलाकर तीन’। उन्हे कोई आर्श्चय नहीं हुआ। ये मोहतरमा रोज अण्डे, दलिया, विदेशी बिस्किट, सूखे ब्रेड कुत्तों को बड़े चाव से खिलाती हैं। पर क्या मजाल की साथ रहने वाले नौकर के बच्चे उनसे ब्रेड का टुकड़ा ले लें। अजीब दौर है। कुत्तों का सम्मान बढ़ रहा है आदमी की मर्यादा घट रही है। मेरी कॉलोनी में ज्यादातर नवधनाढ्य हैं। उनकी पत्नियां कुत्तों को खुद टहलाती हैं। नहलाती, धुलाती हैं। उनकी सेहत का ध्यान रखती हैं। पर अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिए वे ‘आया’ रखती हैं।
मेरे एक मित्र हैं तिवारी जी। उन्होने छोटे बड़े ढेर सारे कुत्ते पाले हैं। मैं उनके घर गया तो उनका कुत्ता भौंकने के बजाए दौड़कर अंदर आ गया और जोर-जोर से आवाज कर दूध पीने लगा। मैंने पूछा कुत्ता बिना हमें जांचे सूंघे कहां गायब हो गया। उनकी पत्नी ने बताया दिनभर दूध पीने में नखरे करता है पर जब भी घर में कोई अतिथि आता है दौड़ कर दूध पी जाता है। उसे लगता है कि घर आए मेहमान कहीं उसका दूध न पी जाएं।
भारत में कोई तीन करोड़ आवारा (सर्वहारा) कुत्ते हैं। इनके अलावा 85 नस्लों के लगभग अस्सी लाख पालतू कुत्ते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुत्तों से जुड़े उघोग में 22 फीसदी का सालाना इजाफा है। फिलहाल इस उघोग का आठ सौ करोड़ का सालाना कारोबार है।
आजकल अमूमन पालतू कुत्तों के नाम विदेशी होते हैं। पहले इनके नाम ज्यादातर ‘मोती’ होते थे। मैं इसकी वजह ढूढ़ता रहा। कुछ रोज बाद समझ में आया कि कांग्रेस को चिढ़ाने के लिए यह समाजवादियों की ही कारस्तानी होगी। आमिर खान ने भी शाहरुख खान को चिढ़ाने के लिए अपने कुत्ते का नाम ‘शाहरुख’ रखा था। बाद में कबीर के जरिए समझ आया कि कुत्ते का मोती नाम पांच सौ बरस पहले से ही रखा जा रहा है कबीर दास कहते हैं “कबीरा कुत्ता राम का, मोतिया मेरो नाव। गले राम की जेवरी, जित खीचें तित जाऊं।।” लेकिन इन बुर्जुआ कुत्तों को देखकर लगता है कि कबीर की ये कहावत भी उलट गई है।
दृष्टी बदल गयी है। कुत्ते अब कुत्ते नहीं लगते। उनके भीतर भी कुत्तेपन या ‘कुत्तई’ का भाव जाता रहा। इनमें भी एक नया अभिजात्य वर्ग उभर रहा है। हमारी परम्परा में कुत्ता भैरव का वाहन है। सबसे ज्यादा वफादार। मैं कैलाश मानसरोवर के आगे उस यम द्वार तक होकर आया हूं। जिसके बाद युधिष्ठिर का साथ सिर्फ उनके कुत्ते धर्म ने निभाया था। इकलौता जानवर जो चांद से लेकर स्वर्ग तक आदमी का साथ निभाता है। अंतरिक्ष में सबसे पहले ‘लाइका’ नाम की रुसी कुतिया गई थी। लिहाज़ा कुत्ता अब गाली नहीं रहा। वह प्रतिष्ठा नाक और इज्जत से जुड़ा है। दरवाजे पर कुत्ता भौंके तो रूतबा बढ़ता है। आदमी और कुत्ते का फर्क कम रह गया है।
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