Monday, October 18, 2021
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सत्य के शिव

Hemant Sharma

आखिर शिव में ऐसा क्या है, जो उत्तर में कैलास से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक वे एक जैसे पूजे जाते हैं। उनके व्यक्तित्व में कौन-सा चुंबक है, जिसके कारण समाज के भद्रलोक से लेकर शोषित, वंचित, भिखारी तक उन्हें अपना मानते हैं। वे सर्वहारा के देवता हैं। राम का व्यक्तित्व मर्यादित है। कृष्ण उन्मुक्त और शिव असीमित व्यक्तित्व के स्वामी। वे आदि हैं और अंत भी। शायद इसीलिए बाकी सब देव हैं। केवल शिव महादेव। वे उत्सव प्रिय हैं। शोक, अवसाद और अभाव में भी उत्सव मनाने की उनके पास कला है। वे उस समाज में भरोसा करते हैं, जो नाच-गा सकता हो। यह शैव परंपरा है। जर्मन दार्शनिक फे्रडरिक नीत्शे कहते हैं- ‘उदास परंपरा बीमार समाज बनाती है।’ श्मशान में उत्सव मनाने वाले वे अकेले देवता हैं। तभी तो पंडित छन्नूलाल मिश्र गाते हैं- ‘खेले मसाने में होरी दिगंबर...!’ यह गायन लोक का है।

सिर्फ देश में नहीं, विदेश में भी शिव की गहरी व्याप्ति है। हिप्पी संस्कृति साठवें दशक में अमेरिका से भारत आई। हिप्पी आंदोलन की नींव यूनानियों की प्रति-संस्कृति आंदोलन में देखी जा सकती है। पर हिप्पियों के आदि-देवता शिव हमारे यहां पहले से मौजूद थे। यों कहें, शिव आदि हिप्पी थे। अधनंगे, मतवाले, नाचते-गाते, नशा करते भगवान शंकर। इन्हें भंगड़, भिक्षुक, भोला-भंडारी भी कहते हैं। आम आदमी के देवता, भूखों-नंगों के प्रतीक। वे हर वक्त सामाजिक बंदिशों से आजाद होने, खुद की राह बनाने और जीवन के नए अर्थ खोजने की चाह में रहते हैं। यही मस्तमौला हिप्पीपन उनके विवाह में अड़चन था। कोई भी पिता किसी भूखे, नंगे, मतवाले से बेटी ब्याहने की इजाजत कैसे देगा! शिव की बारात में नंग-धड़ंग, चीखते-चिल्लाते, पागल, भूत-प्रेत, मतवाले सब थे। लोग बारात देख भागने लगे। शिव की बारात ही लोक में उनकी व्याप्ति की मिसाल है।

विपरीत ध्रुवों और विषम परिस्थितियों से अद्भुत सामंजस्य बिठाने वाला उनसे बड़ा कोई भगवान नहीं है। मसलन, वे अर्धनारीश्वर होकर भी काम पर विजेता हैं। गृहस्थ होकर भी परम विरक्त हैं। नीलकंठ होकर भी विष से अलिप्त हैं। उग्र होते हैं तो तांडव, नहीं तो सौम्यता से भरे भोला-भंडारी। परम क्रोधी, पर दयासिंधु भी। विषधर नाग और शीतल चंद्रमा दोनों उनके आभूषण हैं। उनके पास चंद्रमा का अमृत है और सागर का विष भी। सांप, सिंह, मोर, बैल- सब आपस का वैर-भाव भुला समभाव से उनके सामने हैं। वे समाजवादी व्यवस्था के पोषक हैं। वे सिर्फ संहारक नहीं, कल्याणकारी और मंगलकर्ता भी हैं। शिव गुट निरपेक्ष हैं। सुर और असुर दोनों का उनमें विश्वास है। राम और रावण दोनों उनके उपासक हैं। दोनों पर उनकी कृपा है। आपस में युद्ध से पहले दोनों पक्ष उन्हीं को पूजते हैं। लोक कल्याण के लिए वे हलाहल पीते हैं। वे डमरू बजाएं तो प्रलय होता है। लेकिन प्रलयंकारी इसी डमरू से संस्कृत व्याकरण के चौदह सूत्र भी निकलते हैं। इन्हीं चौदह माहेश्वर सूत्रों से दुनिया की कई दूसरी भाषाओं का जन्म हुआ।

आज पर्यावरण बचाने की चिंता विश्वव्यापी है। शिव पहले पर्यावरण प्रेमी हैं। पशुपति हैं। निरीह पशुओं के रक्षक हैं। आर्य जब जंगल काट कर बस्तियां बसा रहे थे, खेती के लिए जमीन तैयार कर रहे थे, गाय को दूध के लिए प्रयोग में ला रहे थे। मगर बछड़े का मांस खा रहे थे। तब शिव ने बूढ़े बैल नंदी को वाहन बनाया। सांड़ को अभयदान दिया। जंगल कटने से बेदखल सांपों को आश्रय दिया। कोई उपेक्षितों को गले नहीं लगाता। महादेव ने उन्हें गले लगाया। श्मशान-मरघट में कोई नहीं रुकता। शिव ने वहां अपना ठिकाना बनाया। जिस कैलास पर ठहरना कठिन है, जहां कोई वनस्पति, प्राणवायु नहीं, वहां उन्होंने धूनी लगाई। दूसरे सारे भगवान अपने शरीर के जतन के लिए न जाने क्या-क्या द्रव्य लगाते हैं, शिव केवल भभूत का इस्तेमाल करते हैं। उनमें रत्ती भर लोक दिखावा नहीं है। शिव उसी रूप में विवाह के लिए जाते हैं, जिसमें वे हमेशा रहते हैं। इस सबसे अलग लोहिया उन्हें गंगा की धारा के लिए रास्ता बनाने वाला अद्वितीय इंजीनियर मानते थे।

शिव न्यायप्रिय हैं। मर्यादा तोड़ने पर दंड देते हैं। काम बेकाबू हुआ तो उन्होंने उसे भस्म किया। अगर किसी ने अति की तो उनके पास तीसरी आंख भी है। दरअसल, तीसरी आंख सिर्फ ‘मिथ’ नहीं है। आधुनिक शरीर शास्त्र भी मानता है कि हमारी आंख की दोनों भृकुटियों के बीच एक ग्रंथि है और वह शरीर का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। रहस्यपूर्ण भी। इसे पीनियल ग्रंथि कहते हैं। यह हमेशा सक्रिय नहीं रहती, पर इसमें संवेदना ग्रहण करने की अद्भुत ताकत है। इसे ही शिव का ‘तीसरा नेत्र’ कहते हैं।

शिव का व्यक्तित्व विशाल है। वे सर्वव्यापी, सर्वग्राही हैं। सिर्फ भक्तों के नहीं, देवताओं के भी संकटमोचक हैं। उनके ‘ट्रबल शूटर’ हैं। शिव का पक्ष सत्य का पक्ष है। उनके निर्णय लोकमंगल के हित में होते हैं। जीवन के परम रहस्य को जानने के लिए शिव के इन रूपों को समझना जरूरी होगा, क्योंकि शिव उस आम आदमी की पहुंच में हैं जिसके पास मात्र एक लोटा जल है। शायद इसीलिए उत्तर में कैलास से दक्षिण में रामेश्वरम तक उनकी व्याप्ति और श्रद्धा एक-सी है।

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