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Friday, July 03, 2026
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मध्यवर्ग की लहरों पर सवार अन्ना

Hemant Sharma

सरकारी झूठ। तंत्र की बेशर्मी। कांग्रेस की राजनैतिक मूर्खताओं ने अन्ना हजारे को महानायक बना दिया। देखते ही देखते अन्ना भष्ट्राचार के खिलाफ एक ‘ब्राण्ड’ बन गए। ठीक उसी तरह जैसे आज़ादी की लड़ाई में गांधी ‘ब्राण्ड’ बन गए थे। अन्ना अब किसी व्यक्ति का नाम नहीं है। बेदाग़ छवि का नाम है अन्ना। अन्ना प्रतीक हैं भ्रष्ट व्यवस्था से जूझने का। अन्ना नाम बन गया है संकल्प और दृढ़ निश्चय का। इसलिए 16 अगस्त को एक अन्ना के गिरफ़्तार होते ही देशभर में करोड़ों अन्ना सड़क पर हैं। कांग्रेस और सरकार के होश उड़ गए और वह ग़लतियों पर ग़लतियां करती रही। लगा मानो सरकार नहीं है। अन्ना की हर शर्त पर दम तोड़ती नज़र आई सरकार।

केंद्र सरकार ‘अन्ना डिजास्टर’ का प्रबन्धन करने में फेल रही। अन्ना पर लगातार ‘स्टैंड’ बदल कांग्रेस ने जिस बदहवासी और बौखलाहट का परिचय दिया, उससे साफ़ है कांग्रेस, जनता और समाज से कितना कट चुकी है। उसे ज़मीनी असलियत का पता नहीं है। अन्ना के दमन से ऐसा जनसैलाब उमड़ेगा इसका आकलन सरकार और पार्टी दोनों को नहीं था। सरकार जनमानस को समझने के बजाए कुछ वक़ीलों के ज़रिए क़ानूनी इबारतें पढ़ती रही और लोक के आगे तंत्र बौन हो गया।

सवाल अब अन्ना या लोकपाल का नहीं है। बात आगे बढ़ चुकी है। इस मुल्क़ में लोकतंत्र रहेगा या नहीं यह बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। क्या इस देश में विरोध, धरना प्रदर्शन किसी व्यक्ति या सरकार से पूछकर होगा? और वह भी जिसके खिलाफ़ प्रदर्शन होना है। क्या राहुल गांधी अब मायावती से इजाज़त लेकर उत्तरप्रदेश में अपना धरना प्रदर्शन करेंगे? सरकार की सोच देखिए। राहुल गांधी भट्टा परसौल में धरना प्रदर्शन करें तो गांधीवादी। दिल्ली में अन्ना अनशन करें तो असंवैधानिक। क्योंकि ‘वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति’।

दरअसल कांग्रेस ने बाबा रामदेव के आंदोलन को जिस शर्मनाक ढंग से कुचला था। उससे केंद्र मैं बैठी सरकार का न सिर्फ़ अहंकार बढ़ा बल्कि दमन की उसकी हिम्मत भी बड़ी। सरकार ने अन्ना के साथ भी वही तरीक़ा अपनाया जो हथकंडे ग़ुलाम भारत में ब्रिटिश हुकूमत अपनाती थी। लेकिन बिना किसी संगठन के अन्ना का आंदोलन गुजरात से गुवाहाटी तक जिस ढंग से फैला उससे सरकार घुटनों के बल बैठ गई। सरकार के खिलाफ़ देशभर में आक्रोश की जो लहर उमड़ी उसने जाति, वर्ग और उम्र की सीमा तोड़ी। अब तक जो लोग यह कहते थे कि भ्रष्टाचार अब इस देश में मुद्दा नहीं रहा। वे ग़लत साबित हुए। शहरी मध्यवर्ग और नौजवानों को लगा कि अन्ना की हार उनकी निजी पराजय है। अगर यह आंदोलन कुचला गया तो राजनेता निरंकुश हो जाएंगे। गांधी के अनशन का हथियार हमेशा के लिए कुंद हो जाएगा। यह मौका कहीं बेकार न चला जाए। इसी डर ने आम लोगों को सरकार के खिलाफ़ अपनी नाराज़गी जताने और सड़क पर आने को मजबूर किया।

विडम्बना देखिए जिन भ्रष्टाचारियों को अन्ना तिहाड़ में बंद देखना चाहते थे सरकार ने उसी जेल में अन्ना को कैद कर लिया। फिर सरकार को 12 घंटे के भीतर घुटने टेकने पड़े। अन्ना की रिहाई के आदेश हुए। अन्ना ने रिहाई से मना किया। सरकार और झुकी। उसने अनशन की भी इजाज़त दे दी। इस घटनाक्रम में सरकार का इक़बाल गया और कांग्रेस पार्टी की साख भी। अन्ना ने कांग्रेस का जो नुकसान अकेले कर दिया वह नुकसान पूरा विपक्ष मिलकर अब तक के कार्यकाल में नहीं कर पाया था।

अन्ना ने एक झटके में सरकार का नैतिक बल ख़त्म कर दिया। अन्ना के आंदोलन ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि को ध्वस्त कर दिया। भ्रष्टाचार के खिलाफ़ छिड़ी जंग कांग्रेस के खिलाफ़ जंग में तब्दील हो गई। कांग्रेस अनायास भ्रष्टाचार के समर्थक पाले में खड़ी नज़र आई। पहली दफ़ा अन्ना ने शहरी अराजनैतिक वर्ग को सड़कों पर उतारा। जिस युवावर्ग के ज़रिए कड़ी मेहनत कर राहुल गांधी अपनी राजनीतिक ज़मीन तलाश रहे थे। वह नौजवान एक झटके में इस 74 साल के इस बूढ़े के साथ चला गया। राजनीति मंडल आंदोलन के बाद पहली बार संसद से निकल कर सड़क पर आई। और बिना आपातकाल लगे अन्ना ने समूचे विपक्ष को एकजुट कर दिया वामपंथियों से लेकर भाजपा तक। ये है अन्ना की कामयाबी और कांग्रेस की नाकामी।

कपिल सिब्बल, चिदंबरम, दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी हमारे लोकतंत्र के नए जमींदार हैं। ये देश को अपनी जागीर समझते हैं। उनके बयानों की भाषा से तो यही लगता है। यही वजह रही कि इनके बयानों से यह आंदोलन ज्यादा भड़का है। इन्हें नहीं पता कि लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं होता। इसमें असहमति और विरोध जताने का अधिकार भी होता है। दिग्विजय सिंह ने अन्ना को सलाह दे डाली कि राजनीति करनी है तो अन्ना सीधे चुनाव क्यों नहीं लड़ते। पर दिग्विजय सिंह यह सुझाव पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को क्यों नहीं देते? कपिल सिब्बल एक ही राग अलापते हैं कैसा क़ानून बने, यह संसद का अधिकार है। कोई दवाब बनाए यह असंवैधानिक है। पर सिब्बल जी जब नेशनल एडवाइजरी काउंसिल की राय को आप क़ानून मानते हैं तो संसद के सामने नागरिक जमात क्यों अपनी राय नहीं रख सकती?

कांग्रेस पार्टी ने जिस ढंग से अन्ना आंदोलन को ‘हैंडल’ किया उस पर सभी को हैरानी है। पहले एक क़दम आगे फिर दो क़दम पीछे। लगातार नासमझी से भरे फ़ैसलों से ही इस सरकार की किरकिरी हुई। हो भी क्यों ना? जब आपके सलाहकार कपिल सिब्बल और चिदंबरम जैसे लोग होंगे तो यही होगा। क्योंकि वे जनमानस को पढ़ने की बजाय क़ानून की इबारत पढ़ते हैं। कांग्रेस के इन रणनीतिकारों को न देश की समझ है न समाज की। ये वक़ील ‘क्लायंट’ को तो समझ सकते हैं पर देश की नब्ज़ का इन्हें अहसास नहीं है। इनका हिन्दुस्तान दूसरा है। ये गांव-देहात नहीं समझते। जिमखाना समझ रखते हैं। जब संतरी मंत्री बनेंगे तो शायद ऐसे संकट खड़े होंगे। यह राजनैतिक नासमझी और प्रबन्धन की विफलता नहीं तो और क्या है? जो भाजपा अब तक विपक्ष के लिए अछूत बनी थी वह सरकार की करतूतों से फिर विपक्षी एकता की धुरी बनने लगी। अन्ना के सवाल पर सीपीआई से लेकर मुलायम सिंह यादव तक भाजपा के साथ खड़े नज़र आए। ऐसी विपक्षी एकता इमरजंसी में हुई थी। सरकार के प्रबंधकों ने बिना इमरजंसी लगाए ऐसी स्थिति फिर से पैदा कर दी।

अन्ना के इस आंदोलन से सबसे ज्यादा झटका राहुल गांधी को लगा है। पूरे देश के नौजवानों ने जिस ढंग से अन्ना आंदोलन में हिस्सा लिया, शहरी युवाओं का गुस्सा सड़कों पर फूटा। वे राहुल की राजनीति के लिए ख़तरे के संकेत हैं। राहुल देशभर में घूम घूमकर इसी नौजवान पीढ़ी से सहारे राजनीति पर काबिज़ होना चाहते थे। एक झटके में यह आधार इस बूढ़े के साथ चला गया। क्योंकि भ्रष्टाचार से त्रस्त युवाओं को अन्ना के आंदोलन में एक विश्वास और भरोसा दिखा। जिसे राजनीतिक दलों ने तोड़ा था।

राहुल गांधी की राजनैतिक शैली में कांग्रेस के जो युवा, संगठन और सरकार में आए थे उससे एक ख़ास तरह का शहरी मध्यवर्ग, अंग्रेजी दां, अंग्रेजी परस्त शासक वर्ग उभरा था। ज़्यादातर विदेशों में पढ़े इन युवा नेताओं का समाज बोध अंग्रेज़ियत के गिर्द था। अन्ना के आंदोलन से फिर भारत का वह नौजवान सामने आया है जो अब तक सत्ता परिवर्तन में भागीदार बनता रहा है। देहाती-कस्बाई नौजवान। जेपी आंदोलन के बाद से यह पीढ़ी राजनीति में हाशिए पर थी। अब नौजवानों की इस पीढ़ी ने फिर से अन्ना के जरिए अपनी सक्रियता दिखलाई है। मंडल आंदोलन के बाद पहली बार।

इस देश की जनता भ्रष्टाचार का हिसाब लेती है। इतिहास में हमने कई दफ़ा देखा है। चार सौ सांसदो के साथ एक परमप्रतापी प्रधानमंत्री हुए थे। भ्रष्टाचार का आरोप लगा। आंदोलन हुए। चुनाव में जनता ने हिसाब चुकाया। लालू यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। देखिए बिहार के चुनावों में उनकी क्या हालत हुई। मौजूदा सरकार चारों तरफ़ से भ्रष्टाचार से घिरी है। लोहा गर्म है। राजनीति में अब तक दर्शक दीर्घा में बैठे लोग पहली बार आंदोलन के लिए सड़क पर निकले हैं। केवल मोमबत्ती लेकर सड़क पर जाने से कुछ नहीं होगा। पोलिंग बूथ भी जाना होगा। इसके लिए कमर कसिए।

अमूमन हर ज्वलंत मुद्दे पर चुप रहने वाले प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से मुंह खोला तो कहा कि “अनशन ठीक नहीं है”, “संसदीय लोकतंत्र को चुनौती नहीं दी जा सकती”। तो क्या गांधी के देश में अनशन और सत्याग्रह को असंवैधानिक कहा जाए? प्रधानमंत्री यह भी कह गए कि भ्रष्टाचार से निपटने के लिए हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है अजीब बात है। इस देश के प्रधानमंत्री के पास जन आंदोलनों को कुचलने के लिए लाठी है। पर भ्रष्टाचार से निपटने वाली छड़ी नहीं है।

तो प्रधानमंत्री जी, भ्रष्टाचार से निपटने के लिए आपके पास जादू की छड़ी भले न हो। लेकिन इस देश की सर्वशक्तिमान जनता के पास एक छड़ी है। जब वह छड़ी चलती है तो परमप्रतापी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और चार सौ सीटें पाकर ताकतवर प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी को कुर्सी से उतार जनता पटरे पर बिठा देती है। आप तो कठपुतली प्रधानमंत्री हैं और अभी सिर्फ़ शुरूआत है।