ताजमहल एक विस्मय है। उसका नाम आते ही न जाने कितने कहानी किस्से ज़हन में आते हैं। इतिहास की किताबों" /> ताजमहल एक विस्मय है। उसका नाम आते ही न जाने कितने कहानी किस्से ज़हन में आते हैं। इतिहास की किताबों" /> ताजमहल एक विस्मय है। उसका नाम आते ही न जाने कितने कहानी किस्से ज़हन में आते हैं। इतिहास की किताबों" />
ताजमहल एक विस्मय है। उसका नाम आते ही न जाने कितने कहानी किस्से ज़हन में आते हैं। इतिहास की किताबों के कई पन्ने एक साथ फड़फड़ाने लगते हैं। मुमताज महल का चेहरा आंखों में घूमने लगता है। और दिल में शाहजहां की मुहब्बत की खुशबू फैलने लगती है। सोचिए तो कितना अजीब-सा लगता है कि जिस ताज को दीवानों की तरह तामीर कराने में एक शहंशाह ने पूरे बाइस बरस लगा दिए। और जिसके लिए एक दौर का पूरा शाही ख़ज़ाना खाली हो गया। उस एक ताज में आख़िर ऐसा कौन सा जादू है? कैसा तिलिस्म है? और क्या आकर्षण है? यह अबूझ पहेली तर्क से परे है। अपनी ओर खींचने का असीम आकर्षण समेटे दुनिया का एक बेशक़ीमती अजूबा। बेपनाह मुहब्बत की निशानी।
एक ऐसी निशानी जो साढ़े तीन सौ बरस बाद भी जवान है। एक ऐसी निशानी जिसे जितनी बार देखो हर बार उसमें नया अक्स उभर कर सामने आता है। स्थापत्य का एक नया चमत्कार मुस्कुराता है। और हर बार ख़ूबसूरती की नयी परिभाषाऐं बनती है। ताज। वाह ताज।
पूर्णिमा की रात में ताज को देखना। एक अपूर्व अनुभव है। जिसे ग्रहण करने हम इस शरद पूर्णिमा को ताज देखने गए। सुप्रीम कोर्ट की इजाज़त से पूर्णिमा से एक दिन पहले और एक रोज़ बाद ताज रात में दीदार के लिए खुलता है। पचास-पचास के समूह में तीन सौ मीटर दूर से आप ताज को देख सकते हैं। आधी रात के बाद तक सिर्फ साढ़े तीन सौ लोगों को यह मौका हासिल होता है। सुप्रीम कोर्ट में उस प्लेटफार्म की ऊँचाई, लम्बाई, चौड़ाई भी तय की है जहां से ताज को रात में देखा जाता है। दुनिया भर से जिन साढ़े तीन सौ लोगों को शरद पूर्णिमा के रोज़ यह मौका मिला उसमें हम भी थे।
ताजमहल दुधिया रात में निखर रहा था। शरद की मीठी, ठंडी चांदनी में महक रहा था। पूनम का हसीन ज़ेवर पहन के चहक रहा था। हम शरद की पूर्णिमा में ताज को निहार रहे थे और ताज शाहजहां की तरह दूर से चांद में अपनी मुमताज को खोज रहा था। धुली चांदनी रात में, ताज की देह का एक-एक सिरा किसी ताज़ा खिले गुलाब की तरह महक रहा था। चन्द्रमा, सुन्दरता और श्रेष्ठता का पर्याय है। और ताज ख़ूबसूरती का दूसरा नाम है। दोनो हमारे सामने थे। रात जवान थी। और माहौल में सन्नाटे का संगीत। आंख और कान दोनों में अपूर्व तृप्ति का एहसास था। ताज से सट कर पीछे बहती यमुना की कलकलाहट को चीरते उन हज़ार हाथियों के पांव की ध्वनि भी सुनाई दे रही थी। जिन्होंने ताज की तामीर में रखे जाने वाले पत्थरों को अपनी देह पर ढोया था। ताज में लगे उन अट्ठाइस तरह के बहुमूल्य पत्थरों और रत्नों की आभा रह-रह कर चमक रही थी। जो सोलहवीं शताब्दी में सफेद संगममर में जडे़ गए थे। हां कंधार से लाए गए उस मुख्य शिल्पी मो. इस्माइल खां का कहीं कोई नाम नहीं था और ना ही छ: महिनो में चुने गए सैतीस दक्ष कारीगरों और उन बाइस हज़ार मज़दूरों का ही कोई नामलेवा था जिनकी उंगलियों की बुनावट से ताज इस रात में भी दमक रहा था। कवि-मित्र आलोक का एक दोहा बार-बार याद आ रहा था- उजली-उजली देह पर नक़्क़ाशी का काम, ताजमहल की ख़ूबियां मज़दूरों के नाम।।
हमारे साथ दर्जन भर मित्र गण शरद पूर्णिमा की रात ताज देखने गए थे। खगोल शास्त्र के मुताबिक उस रोज चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है। पूरे सोलह कलाओं का चांद। समूचे साल में इस दिन का चांद आकार में सबसे बड़ा दिखता है। चंद्रमा में शीतलता और सुंदरता का समन्वय है। बाह्य सौन्दर्य कई बार मोहक, मादक और दाहक होता है। जब उससे अन्तर सौन्दर्य मिलता है तो शीतल और शांतिदायक बनता है। ताज अन्तर सौन्दर्य को बढ़ा रहा था। और चंद्रमा बाह्य सौन्दर्य को।
ताज को देखने का हमारा वक्त आधी रात के बाद ख़त्म हुआ। पर मन नहीं भरा। सी.आई.एस.एफ के जवानों ने ताज का परिसर आधी रात के बाद आदमजात से ख़ाली करा। ताला डाल दिया। अब हम ताज के समाने वन विभाग के गेस्ट हाऊस में थे। इस गेस्ट हाऊस और ताज के बीच महज कुछ पेड़ हैं। इस लिहाज़ से हम ताज के और करीब थे। ताज और अपना संवाद तड़के तक चला।
इसी शरद पूर्णिमा की चांदी जैसी रात में भगवान कृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया था। मानते है कि इस रात चंद्रमा से अमृत बरसता है। शरद पूर्णिमा यानी जागृति का उत्सव। वैभव का उत्सव। आनंद का उत्सव। इस उत्सव से अपना तीन पीढ़ी का रिश्ता है। पिता और बेटे दोनों का जन्मदिन इसी रोज है। इसलिए हमें और आनंद था। हम चंद्रमा से अमृत और ताज से सौन्दर्य रस ग्रहण कर रहे थे। पास में कोई 40 किमी दूर वृन्दावन में रास की गूंज थी। हम सुबह वृन्दावन पहुंचे। गोपियों के महारास और अमृत स्नान का अहसास लेने । गीत गेविंद से लेकर मृच्छकटिकम तक सभी ग्रन्थों में इस महारास के किस्से मौजूद है। हमने देखा लोग उस व्रज की रज को खा रहे थे। जिसका वर्णन रसखान ने भी किया है- मानुष हौं तौ वही रसखानि बसौं ब्रज गोकु़ल गाँव के ग्वारन। जौ खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल कदंब की डारन।।
प्रकृति की लीला से हम चमत्कृत थे। उस बेशकीमती अहसास के साथ हम लौटे। अब शरद के बाद हेमंत को आना है। यह मन को साधने का दौर है। आगे फिर कभी।
Top News
Latest News