जनता बड़ी है या संसद? यह बहस सरकार ने छेड़ी है। अन्ना के आंदोलन को भटकाने के लिए। क़ानून सड़क पर नही" /> जनता बड़ी है या संसद? यह बहस सरकार ने छेड़ी है। अन्ना के आंदोलन को भटकाने के लिए। क़ानून सड़क पर नही" /> जनता बड़ी है या संसद? यह बहस सरकार ने छेड़ी है। अन्ना के आंदोलन को भटकाने के लिए। क़ानून सड़क पर नही" />
जनता बड़ी है या संसद? यह बहस सरकार ने छेड़ी है। अन्ना के आंदोलन को भटकाने के लिए। क़ानून सड़क पर नहीं, संसद में बनता है। अन्ना संसदीय प्रक्रिया की अवमानना कर रहे हैं। अन्ना संसदीय प्रक्रिया को ब्लैकमेल और बुलडोज़ कर रहे हैं। पर इन कुतर्कों की आड़ में अब भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उठा जनसैलाब नहीं रुकने वाला। अगर इन दावों में सच्चाई थी तो आज सरकार घुटनों के बल बैठकर अन्ना की मांगे मानने पर सहमत क्यों हो रही है। दरअसल, अन्ना के बढ़ते जनसमर्थन से जब डर लगा तो संसद के भी हाथ-पांव फूले और बातचीत शुरु हुई। यानी बात पहले भी हो सकती थी। बहानेबाज़ी के बजाय।
हमारे लोकतंत्र में संप्रभुता जनता के पास है। संसद उससे प्रभुता पाती है। जनता की कोख से ही संसद का जन्म होता है। वही जनता जिसका वोट तंत्र को लोक देता है। पांच साल के लिए संसद चुन क्या लोक अपने हाथ-पांव काट, मुंह पर पट्टी बांध ले? मनमोहन सिंह और कपिल सिब्बल के उक्त विचारों से तो ऐसा ही लगता है। डॉक्टर लोहिया ने कहा था कि ज़िन्दा क़ौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करतीं। बाद के समाजवादियों ने उसे और आगे बढ़ा दिया कि ज़िंदा क़ौमें कभी इंतज़ार नहीं करतीं। जे.पी. ने भी वायदे पूरा ना कर पाने पर जब प्रतिनिधि वापस बुलाने की बात की थी तो क्या ये जननेता संसद की अवमानना कर रहे थे? जनआंदोलनों के ये दोनों नेता जनता की सर्वोच्चता मानते थे।
कोई इस सरकार से पूछे कि संसद की गरिमा कौन गिरा रहा है? जन-आंदोलनों से संसद की गरिमा नहीं गिरती। सदन की गरिमा गिरती है ए.राजा, कनिमोझी और कलमाड़ी जैसे सांसदों से। संसद की गरिमा गिरती है इस सूचना से कि 543 सांसदों में से कोई डेढ़ सौ (28 प्रतिशत) आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। सदन की गरिमा गिरती है कैबिनेट प्रणाली के इतर एक सुपर कैबिनेट से जिसे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद कहते हैं। संसद की गरिमा गिरती है जब संसदीय फ़ैसले सदन के बाहर 10 जनपथ में लिए जाते हैं। संसद की गरिमा अन्ना नहीं गिरा सकते जिनकी आस्था गांधीवादी मूल्यों में है। सादगी, ईमानदारी और सत्याग्रह जिसके हथियार हैं। वरना है किसी राजनीतिक दल में ताक़त जो समूचे देश में एक आवाज़ पर इतने लोगों को सड़कों पर निकाल दे।
दरअसल अन्ना और उनके आंदोलन को लेकर कांग्रेस और सरकार की नीयत कभी साफ़ नहीं रही। हर बार दोहरे मापदण्ड रहे। दोहरी भाषा थी। नीयत भी अन्ना और उनके समर्थकों को ध्वस्त करने की रही। मौजूदा गतिरोध के मूल में यही वजह थी। पहले कहा गया कि अन्ना का अनशन संविधान विरोधी है। राहुल गांधी भट्टा परसौल में धरना दें तो गांधीवादी। अन्ना संविधान विरोधी। फिर अन्ना और उनकी टीम की छवि को ध्वस्त करने के लिए बेबुनियाद आरोपों का दौर चला। ऐसे आरोप लगे कि संवाद टूट गया। टीम अन्ना का रवैया सख्त हुआ। गतिरोध इस कदर बढ़ा कि बात कौन करे इस बात का संकट था। सारी फ़जीहत कराने के बाद सरकार ने प्रणब मुखर्जी को आगे किया। शायद पहली बार सरकार को समझ आया कि मसला राजनीतिक है। इसका वक़ीलों के ज़रिए क़ानूनी हल नहीं निकाला जा सकता।
यह समझ की दरिद्रता है कि अन्ना के आंदोलन को अवैधानिक और ग़ैरक़ानूनी कहा गया। गांधी के देश में अनशन और सत्याग्रह को ब्लैकमेल कहा गया। अनशन और सत्याग्रह को महात्मा गांधी ने अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने का ब्रह्मास्त्र माना था। आज उन्ही गांधी की पार्टी का सत्याग्रह के ख़िलाफ़ यह रवैया है। वैसे आज की कांग्रेस से गांधी की समझ रखने की अपेक्षा नादानी है। क्योंकि आज के ज़्यादातर कांग्रेसियों की गांधी के प्रति समझ मुन्नाभाई फ़िल्म देखकर बनी है। इसलिए सत्याग्रह और अनशन पर अगर सरकार का रुख़ ऐसा है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
जिन्हें इस वक्त संसदीय प्रणाली याद आ रही है। वे उस वक्त कहां थे जब लोकपाल बिल की ड्राफ़्टिंग कमेटी में विपक्ष का कोई प्रतिनिधि नहीं था। सिर्फ़ नागरिक जमात और सरकार मिलकर बिल बना रहे थे। अब जब मामला फंसा तो विपक्ष याद आया। सर्वदलीय बैठक बुलाई गई। संसदीय प्रणाली में विपक्ष के बिना भी क़ानून बनता है। उस वक़्त इस प्रणाली का ध्यान क्यों नहीं रहा। उस वक़्त सरकारी अहंकार ने विपक्ष को हाशिए पर डाल क़ानून का मसविदा बना दिया। जिसे बाद में सिविल सोसाइटी ने ख़ारिज किया। तब प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक बुलाई।
आंदोलन के प्रति कांग्रेस की ‘मिसहैंडलिंग’ का नुकसान तो राहुल गांधी को भी हो गया। इसका असर चुनाव में दिखेगा। जिस भ्रष्टाचार को उन्होंने मुद्दा बनाया। ग़ैरकांग्रेसी राज्यों में जाकर ज़ोर-ज़ोर से कहा दिल्ली से जो पैसा चलता है वह ज़िलों तक नहीं पहुंचता। बिचौलिए खा जाते हैं। अन्ना इसी भ्रष्टाचार को मिटाने की बात तो कर रहे थे। पूरे आंदोलन में राहुल गांधी की रहस्यमयी चुप्पी ने राहुल की भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई के प्रति संदेह पैदा किया है। उनकी लड़ाई दिखावा नज़र आई। अब वे कैसे इस सवाल को फिर से उठाएंगे।
इस घमासान में सरकार का इक़बाल भी गया और पार्टी की साख भी। जनाक्रोश का निशाना अलग बनी। हालांकि पूरी फ़जीहत कराने के बाद सरकार हर सवाल पर घुटने के बल बैठी। सरकार ने वही किया जिसे पहले किया जा सकता था।
जन दबाव और आंदोलन दरअसल प्रक्रियागत पेचीदगियां, प्रणाली और क़ायदे-क़ानून नहीं समझते। लोगों के इस सवाल का सरकार के पास कोई जवाब नहीं है कि 62 साल से लोकपाल क्यों अटका रहा। कितनी बार संसद में पेश हुआ। कितनी बार स्थायी समिति में गया। अब सरकार फिर से स्थायी समिति की आड़ में और ज़्यादा समय क्यों चाहती है। आम जनता सिर्फ़ यह समझती है कि जब सांसदों की अपनी तनख़्वाह और सुविधा बढ़ाने की बात होती है तो बिल तीन मिनट में पास हो जाता है लेकिन स्थायी समिति के अध्यक्ष लोकपाल के सवाल पर अभी तीन महीने का वक़्त और चाहते हैं।
आंदोलन की हवा निकालने के लिए षड़यन्त्र चौतरफ़ा हुए। पर हर षड़यन्त्र पर आंदोलन ने और ज़ोर पकड़ा। यही इसकी ताक़त थी। सही है कि लोकतंत्र में अपनी बात रखने की आज़ादी सबको है। लेकिन जब आंदोलन चरम पर हो अन्ना की जान कैसे बचे इसकी चिंता सब कर रहे हों। ऐसे वक्त नागरिक जमात में भेद पैदाकर एक और बिल लेकर कुछ लोग नमूदार हुए। यह कितना औचित्यपूर्ण था। सवाल बड़ा है। टाइमिंग को लेकर। अब तक यह बिल कहां था? मालूम हो कि बिल का प्रारूप देने वाली अरूणा रॉय राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य हैं।
अन्ना का यह आंदोलन कोई अचानक फूटा लोगों का ग़ुस्सा नहीं है। लोगों का ग़ुस्सा सालों से सुलग रहा था। गए एक साल में परत दर परत भ्रष्टाचार और घोटालों का जो खुलासा हुआ उसने इस आंदोलन की ज़मीन तैयार की थी। पिछले एक साल में सबसे ईमानदार सरकार के दो लाख करोड़ का घोटाला सामने आया। पहले आदर्श सोसायटी फिर टूजी स्पेक्ट्रम फिर राष्ट्रमंडल खेल, उसके बाद एयर इंडिया में जहाज़ों की ख़रीद का मामला और अब ताज़ा मामला के. जी. बेसिन से भ्रष्टाचार का दानव निकला। अन्ना ने तो सुलग रही आग की सिर्फ़ राख झाड़ी है। लपटें तो पहले से मौजूद थीं। अन्ना का आंदोलन चुनौती संसद को नहीं मौजूदा राजनीति को है। अभी भी चेतने का वक़्त है। राजनीतिज्ञों के लिए। उन पर भरोसा टूटा है। लोकतंत्र में यह ख़तरा बड़ा है। संसद बनाम जनता के विवाद से कहीं ज़्यादा।
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