बदलते दौर की राजनीति में रथयात्रा
रथ आवाम से नहीं जोड़ता है। जनता से दूर ले जाता है। रथ सामंती प्रतीक है। हमारी परम्परा में रावण रथी है। और रघुवीर विरथ। रथ लोक से काटता है। फिर भी लालकृष्ण आडवाणी बिना घोड़ों के रथ पर सवार होने को आतुर हैं। पार्टी, मित्रों और संघ परिवार की इच्छा के खिलाफ आडवाणी की रथयात्रा 11 अक्टूबर से निकलेगी। आडवाणी जी ‘आदि रथयात्री’ हैं। उनकी यात्रा के निहितार्थ सब जानते हैं। आखिर क्यों वे संघ और भाजपा के कई अपमानजनक शर्तों के बावजूद रथ पर सवार हो रहे हैं? कौन सी मजबूरी है कि प्रधानमंत्री पद की आमरण उम्मीदवारी छोड़ने को वे तैयार नहीं हैं?
देश इक्कीसवीं सदी के उस मुकाम पर है। जहां से राजनीति के सूत्र युवाओं के हाथ जा रहे हैं। देश में 72 करोड़ 99 लाख मतदाताओं में से 50 प्रतिशत युवा हैं। राहुल गांधी मुकाबले में हैं। युवा आगे देख रहा है। और रथ पीछे ले जाता है। इसलिए आडवाणी की रथ यात्रा युवावर्ग को लुभाती नहीं है। शायद इसी सोच से संघ और भाजपा अपना नेता बदलना चाहते हैं। वे दूसरी पीढ़ी को सत्ता सौंपना चाहते हैं। राजनीति के प्रतीक बदलना चाहते हैं। रथ, राम, अयोध्या और उग्र हिन्दुत्व से परे नए प्रतीक। ताकि भाजपा एक ऐसा उदार राजनैतिक दल बने जिसमें युवा वर्ग अपना भविष्य देख सके। ऐसे नए वैचारिक उपकरण बने जिससे युवा मतदाताओं के तार सीधे जुड़ सके। इसलिए संघ का जोर दूसरी पीढ़ी की ओर है। पर आडवाणी जी की प्रधानमंत्री पद की चाह रास्ते की अड़चन। आडवाणी की दुर्दशा देखिए। भाजपा के भीतर जो गडकरी, जेटली, वेंकैया, सुषमा स्वराज और नरेन्द्र मोदी इस रथयात्रा के खिलाफ खड़े हैं। वे सब आडवाणी जी द्वारा गढ़े गए हैं। पार्टी में आडवाणी ने उन्हें बड़ा बनाया है। पर उस सवाल पर जंग खाए लौह पुरुष पार्टी में अकेले पड़ गए हैं।
दरअसल आडवाणी जी दो परिवारों के बीच पिस रहे हैं। एक- उनका अपना परिवार है। जो उन्हें प्रधानमंत्री देखना चाहता है। उसकी दलीलें हैं, कि मोरारजी भाई तो 83 की उम्र में प्रधानमंत्री बने थे। फिर दादा की सेहत अच्छी है। दिमाग दुरूस्त है। पार्टी में सबसे ज्यादा योगदान है। अब कम्र आया तो दूध की मक्खी की तरह बाहर। दूसरा है संघ परिवार। जो किसी भी कीमत पर आडवाणी जी को अब भाजपा की मुख्यधारा में रहने देना नहीं चाहता। वह जल्दी में है दूसरी पीढ़ी के लिए। इन दो परिवारों के बीच मुश्किल हैं। फिर क्या करें लौहपुरुष? एक सम्मान जनक रास्ता है। वे उस पर क्यों नहीं जाना चाहते? अगर आडवाणी जी गांधी, लोहिया, जयप्रकाश या अन्ना से नहीं सीख सकते। तो उन्हें कम से कम सोनिया गांधी से ही सीखना चाहिए। कैसे कुर्सी की दौड़ से अलग रह कर राजनीति में हस्तक्षेप किया जा सकता है। सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष हैं। पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए वे सब कुछ करती हैं क्या भाजपा के लिए आडवाणी के मन में ऐसी भावना नहीं जाग सकती?
आरएसएस के संकेतों, इशारों और अब साफ-साफ कहने के बावजूद आडवाणी जी राजनीति से हटने को तैयार नहीं हैं। देश ने पिछले आम चुनावों में नेता के तौर पर उन्हें खारिज किया है। इसलिए संघ गए दो साल से आडवाणी के राजनैतिक सन्यास की घोषणा सुनना चाहता है। आडवाणी उस रास्ते जा भी रहे थे। पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हिलती कुर्सी देख। वे लौट आए। उनकी लालसा जगी। उन्हें लगा भाजपा में सामुहिक नेतृत्व पर बात नहीं बन रही है। वहां प्रधानमंत्री पद के लिए आधा दर्जन से ज्यादा उम्मीदवार हैं। ऐसे में रथयात्रा के जरिए वे फिर से केंद्र में आ सकते हैं। दुबारा दावा ठोक सकते हैं। पर उनकी इस योजना की हवा इस बार विपक्ष ने नहीं अपनों ने ही निकाल दी।
यही वजह है 11 अक्टूबर से निकलने वाली उनकी रथयात्रा इस बार कोई माहौल पैदा नहीं कर पा रही है। पार्टी के बड़े नेताओं और मुख्यमंत्रियों ने हाथ खींच लिए हैं। पार्टी का यह रुख देख आडवाणी जी ने रथयात्रा नीतिश कुमार के हवाले कर दी है। वरना हर कोई जानता है कि जयप्रकाश नारायण की जन्मस्थली सिताब दियारा बिहार में नहीं उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में है। सिताब दियारा का जेपी का मकान स्मारक और कुटुम्ब के लोग आज भी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में रहते हैं। घाघरा के कटान से गांव का सीमांत बिहार के सारण जिले में जरूर पड़ता है। पर सिताब दियारा रेवन्यू गांव यूपी का है। यूपी में हवा नहीं बन सकती। इस दौरान यूपी में राजनाथ सिंह, कलराज मिश्रा दोनो अपनी अपनी यात्राएं लेकर यहां निकल रहे हैं। सो उत्तर प्रदेश में पार्टी ने हाथ खड़े किए। इसलिए रथयात्रा अब नीतिश कुमार के हवाले हुई। इस शर्त के साथ कि यात्रा में लगने वाले नारे, पोस्टर में ऐसा कोई जिक्र और उल्लेख नहीं होगा जो रथयात्री को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताए।
अयोध्या की राम रथयात्रा के बाद आडवाणी जी की कई रथ यात्राएं निकली हैं। सबका हश्र क्या था? जनता का विश्वास ये यात्राएं नहीं जीत सकी। रथयात्रा एक कर्मकाण्ड बन गयी। जो हर चार-पांच साल पर उस वक्त होने लगी जब आडवाणी पार्टी और देश की राजनीति में खुद को अप्रासंगिक महसूस करते। इस बार तो इस रथयात्रा से उन नरेन्द्र मोदी ने भी अपने को अलग कर लिया। जो मोदी गांधी नगर में लालकृष्ण आडवाणी को सरदार पटेल की ‘ओरिजनल कार्बन कॉपी’ कहते थे। पार्टी के दूसरे नेता उनकी इस यात्रा का मजाक उड़ा रहे हैं। लौहपुरुष की अपनी ही पार्टी में यह स्थिती कारुणिक है।
लालकृष्ण आडवाणी ने निश्चित तौर पर भाजपा को सत्ता की राजनीति के सर्वश्रेष्ठ दिन दिखाए हैं। जनसंघ से भाजपा तक उनका योगदान बेजोड़ रहा है। उनकी पहली रथयात्रा ने पूरे देश में रामजन्मभूमि आंदोलन के लिए एक उफान पैदा किया था। उस लिहाज से वे पार्टी के केंद्र में रहे। आडवाणी की खुद की यात्रा भी कम रोचक नहीं है। पहले वे अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक रहे। फिर उनके समकक्ष हुए। बाद में प्रतिद्वंदी बने। हालांकि पार्टी के भीतर उनकी कभी सर्वमान्य नेता की हैसियत नहीं रही। यह संयोग है कि अटल बिहारी वाजपेयी के प्रतिद्वंदी बनने के बावजूद आडवाणी तभी तक ताकतवर थे। जब तक वे अटल बिहारी वाजपेयी की छाया में थे। उससे निकलते ही वे न सिर्फ असरहीन हुए। पार्टी के क्षत्रपों ने उनका विरोध शुरु कर दिया। उन्हे लगा कि प्रधानमंत्री बनने के लिए अटल जैसा उदार चेहरा चाहिए। अपने चेहरे को उदार बनाने के लिए उन्होंने जिन्ना का सहारा ले लिया। बस यहीं से गड़बड़ हुई। जिन्ना प्रकरण के बाद संघ ने उनकी नाक में नकेल डाली। बीजेपी के नए नेतृत्व ने उन्हें लगभग धकिया कर नेतृत्व की दौड़ से बाहर किया। पर कमजोर होते मनमोहन सिंह और भ्रष्टाचार के आरोपों से साख खोती सरकार ने उनकी सारी उम्मीदें जगा दी। मध्यावधि चुनावों की संभावनाओं से वे हड़बड़ी में आ गए। लोग जानना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार इतना बड़ा सवाल था तो राजस्थान में वसुंधरा सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर वे हमेशा वसुंधरा के साथ खड़े क्यों नजर आए! उत्तराखण्ड में और कर्नाटक के येदियुरप्पा प्रकरण में लंबे समय तक क्यों चुप्पी साधे रहे। इसलिए यह रथयात्रा भ्रष्टाचार के खिलाफ ईमानदार कोशिश का अभियान नहीं बन पा रही है।
जो भी हो आडवाणी के साथ संघ ने जो बर्ताव किया उसे वे शायद ही भूल पाएं। एक पुराने स्वंयसेवक से जबरन राजनैतिक नेतृत्व दूसरी पीढ़ी को दिलवाया। फिर नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी छीनी। अब तमाम अपमानजनक शर्तों के साथ उन्हें रथ पर बैठने की इजाजत मिली है। वह भी तब जब संघ और पार्टी दोनो का नेतृत्व आडवाणी से जूनियर है। कोई और होता तो घर बैठ जाता। सवाल है? अब आडवाणी क्या करें? एक- उन्हें चुनाव न लड़ने की घोषणा करनी चाहिए। दो- उन्हें जयप्रकाश नारायण की तरह व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का ऐलान करना चाहिए। खुद को सत्ता की दौड़ से बाहर बताना चाहिए। तभी आडवाणी के प्रति लोक में विश्वास जगेगा। कार्यकर्ता जुड़ेंगे। उनकी यात्रा भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग की ईमानदार कोशिश मानी जाएगी वरना यात्रा की हवा तो खुद पार्टी ने ही निकाल दी है। अब लालकृष्ण आडवाणी को तय करना है कि वे राजनीति में सुनील गावस्कर की तरह शतक लगाकर रिटायर होंगे। या कपिलदेव की तरह जबरन रिटायर किए जायेगें। उनका रास्ता कपिलदेव की ओर जा रहा है।