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कृष्ण के साथ अपना रिश्ता जितना आत्मीय है, किसी और देवता के साथ नहीं। बचपन से एक तादाम्य है। सखा भाव है। राज-रंग, छल-कपट, भक्ति, योग, भोग, राजनीति, चोरी, मक्कारी, झूठ, फरेब जिस ओर नजर डालें, गोपाल खड़े मिलते हैं। हमारे नजदीक दिखते हैं। कृष्ण का यही अनूठापन उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाता है।
सच पूछिए तो एक कृष्ण ही हैं जो हर उम्र में हमउम्र लगते हैं। शायद इसीलिए जन्माष्टमी पर दिल बच्चा हो जाता है। इस उत्सव को मनाने में वैसा ही जोश हममें रहता है। जैसा 40 बरस पहले था। आखिर क्यों.? दस बरस की उम्र में तो धर्म के प्रति वैसी आस्था भी नहीं बनती। तो आखिर क्या है ? इस कृष्ण में जो हमेशा संगी साथी सा दिखता है।
कृष्ण हुए तो अतीत में। लेकिन हैं भविष्य के। उनका देवत्व धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाईयों पर होकर भी गंभीर नहीं है। वह जिन्दगी से उदास, निराश, भागा हुआ नहीं है। कृष्ण हर परिस्थिति में अकेले नाचते मिलते हैं। हंसते गाते मिलते हैं। अतीत के सभी दु:खवादी धर्म की नींव पर। डॉ. लोहिया की माने तो कृष्ण उन्मुक्त समाज के प्रथम पुरुष थे। यही उन्मुक्तता उन्हें देवत्व से कभी कभी दूर ले जाती है। वे कायदे तोड़ते थे। ठीक उसी तरह जैसे आज का सत्ता प्रतिष्ठान बुद्घि के जरिए नियम तोड़ता है। इसलिए आज भी कृष्ण की निरंतरता बनी है।
सूर के कृष्ण गोवर्धनगिरी धारी, कुशल रणनीतिकार और द्वारका नरेश कम। नटखट माखनचोर ज्यादा हैं। इसीलिए हम बचपन में कभी रामनवमी या शिवरात्री में उतने उत्साह से भरे नहीं थे। जितना जन्माष्टमी के। सात रोज पहले से तैयारियां होती थी। बुरादे का रंग रोगन होता था। घर से दस किमी दूर बिजलीघर साइकिल से जाकर खंगर (जला कोयला) लाना। गोवर्धन पर्वत की झांकी के लिए। पूरे साल अपने जेबखर्च से पैसा बचा-बचा कर खिलौने खरीदना। हर दफा एक नएपन से साथ। मेरी पत्नी बताती है ऐसी ही तैयारियां उनके यहां भी होती थीं। फर्क इतना था वे कार से जाती थी मैं साइकिल से। वो सजावट के सामान खरीद कर लाती थी। और मैं जुगाड़ से। पर साइकिल और कार का यह अंतर कृष्ण का जन्मदिन मनाने के उत्साह को कम नहीं करता था।
यह आकर्षण मात्र इसलिए नहीं है कि देवताओं की श्रृंखला में इकलौते कृष्ण हैं जो सामान्य आदमी के करीब हैं। बल्कि इसलिए हैं कि कृष्ण के जन्म के साथ ही उनके मारे जाने की धमकी है। यह धमकी उनके देवत्व को चुनौती देती है। जन्म के बाद प्रतिपल उनकी मृत्यु संभावी है। किसी भी क्षण मृत्यु आ सकती है। इस आशंका में उनका बचपन बीतता है। कृष्ण ऐसी जिंदगी है। जिसके दरवाजे पर मौत कई बार आती है। और हार कर लौटती है। ठीक वैसे ही जैसे आज के असुरक्षित समाज में पैदा होते ही मृत्यु से लड़ना आम आदमी की नियति है। इसलिए हमें कृष्ण अपने पास के लगते हैं।
वे कृष्ण ही थे जिन्होंने मां का मक्खन चुराने से लेकर दूसरे की बीबी हरने तक का काम किया। महाभारत में एक ऐसे आदमी से झूठ बुलवाया जिसने कभी झूठ नहीं बोला। उनके अपने झूठ अनेक हैं। सूर्य को छुपा कर नकली सूर्यास्त करा दिया। ताकि शत्रु मारा जा सके। भीष्म के सामने नपुंसक शिखंडी खड़ा कर दिया। ताकि बाण न चले। खुद सुरक्षित आड़ में रहे। उन्होंने अपने मित्र की मदद स्वयं अपनी बहन को भगाने में की। यानी कृष्ण एक पाप के बाद दूसरा पाप बेहिचक करते हैं। उनके कायदे कानून जड़ नहीं है। धर्म की रक्षा के लिए परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं।
फिर भी सदियों के अंतराल के बाद ही उनका बांकपन, उनका अनूठा व्यक्तित्व हमे आकर्षित करता है। आज के संदर्भ में कृष्ण को समझना जरूरी है। मनुष्य की बनाई यह सभ्यता। कृष्ण की समझ से सहज हो सकेगी। दु:खवादी नहीं रहेगी। निषेधवादी नहीं रहेगी। हमें समझ पड़ेगा कि जीवन आनंद है। उत्सव है। उसके विरोध में कोई परमात्मा नहीं बैठा है। धर्म की कट्टरता उस फोल्डिंग कुर्सी की तरह समझ आने लगेगी। जिसे जररूरत पड़ी तो फैलाकर बैठ गए। नहीं तो मोड़ कर कोने से टिका दिया।
कृष्ण ही नहीं, उनकी बोली-बानी गीता, युद्ध क्षेत्र में लिखी गई पहली पुस्तक है जिसका मुकाबला दुनिया की कोई किताब नहीं करती। धर्म के दायरे से बाहर भी। कृष्ण केवल रणकौशल के जानकार ही नहीं थे। रणनीतिकार और सत्ता प्रतिष्ठान की बारीकियों को भी बखूबी समझते थे। वे रसिक भी बड़े थे। आनन्दमार्गी थे। प्रेम की संयोग और वियोग दोनों ही अवस्थाओं से सीधे जुड़े थे। रम जाने का सारा कौशल जानते थे कृष्ण। एकाकार होना उन्हीं ने सिखाया – ‘नंदग्राम की भीड़ में गुमे नंद के लाल l सारी माया एक है, क्या मोहन क्या ग्वाल ll’ शरद पूर्णिमा की आधी रात को कृष्ण ने वृन्दावन में सोलह हजार गोपिकाओं के साथ एक साथ रास किया था। इस महारास की खासियत थी कि हर गोपिका को कृष्ण के साथ नाचने का आभास था। उनका आनंद अटूट था। ‘निसदिन बरसत नैन हमारे। सदा रहत पावस ऋतु हम पर जब ते स्याम सिधारे।।’ वाली हालत से कौन नहीं गुजरा होगा अपनी किशोरावस्था में।
कृष्ण के मायने ही हैं जिस पर संसारी चीजें खींचती हो। यानी चुम्बकीय व्यक्तित्व। आकर्षण का केंद्र। कृष्ण भक्त भी हैं और भगवान भी। इसलिए उनसे रिश्ता सीधा और सहज जुड़ता है। जीवन जीने में आने वाली तमाम चुनौतियों के जवाब उनके पास वर्तमान समाजिक संदर्भों में हैं। समस्याएं, सत्ता के षड्यंत्र, रिश्तों की नाजुकता आज भी वैसी ही है जो कृष्ण-काल में थी।
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