Monday, June 29, 2026
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हाशिये का पंछी

Hemant Sharma

अखबार में एक तस्वीर छपी है। संसद के गलियारे में उल्लुओं ने अपना डेरा जमा लिया है। यानी संसद के भीतर क्या हो रहा है, इस पर अब उल्लुओं की भी पैनी नजर है। अजब हैं उल्लू। रह रहे हैं सदन के गलियारों में और प्रभाव छोड़ रहे हैं भीतर। पूरे देश में उल्लुओं के अस्तित्व पर संकट है। शायद इसीलिए उल्लुओं ने संसद की सुध ली है। इस तथ्य के बावजूद ‘बर्बादे-गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी है।’

हमारे आसपास उल्लूपन का विस्तार भले ही तेजी से हो रहा है, पर बेचारा उल्लू विलुप्ति की ओर है! तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास ने इस खूबसूरत और बिंदास पक्षी को ग्रस लिया है। उल्लू गजब का प्राणी है। धीर, गंभीर दार्शनिक और वीतरागी। ‘न ऊधो का लेना न माधो का देना।’ पश्चिमी दर्शन में उल्लू ज्ञान की देवी का वाहन है, हमारे यहां लक्ष्मी की सवारी। इसीलिए तय है कि धन कमाने की कला उल्लू जरूर जानता होगा! वह रात के अंधेरे में प्रकाश फैलाता है। घुप्प अंधेरे में जब कुछ नहीं सूझता तो रास्ता दिखलाता है। किसानों का दोस्त है। चूहे और खेती को नुकसान पहुंचाने वाले दूसरे कीड़ों का खात्मा करता है। फसल को बचाता है। बड़े काम का होता है उल्लू।

बचपन में घर के पास नीम के पेड़ के नीचे एक पकौड़ी बेचने वाली बुजुर्ग रहती थी। बच्चे उसे प्यार से नानी कहते थे। नीम के कोटर में उल्लुओं का एक जोड़ा रहता था। जब तक पकौड़ियां बनती थीं, हम उल्लुओं से खेलते थे। वे बिना किसी प्रतिक्रिया के दार्शनिक अंदाज में हमें देखते रहते थे। कुछ रोज बाद एक-एक करके दोनों उल्लू गायब हो गए। हम कई दिनों तक उन्हें ढंूढ़ते रहे। बाद में पकौड़ी वाली नानी ने जो बताया उसे सुन कर हमारे होश उड़ गए। उनके मुताबिक दिवाली की रात एक तांत्रिक ने उल्लू की बलि दे दी। उसकी आंख, दांत और पांव का इस्तेमाल लक्ष्मी की सिद्धि के लिए किया। यह जान हम उदास थे। जिस उल्लू से पहली बार अपना संवाद बना था, वह तंत्र-मंत्र की भेंट चढ़ गया। हमने नीम के पेड़ के नीचे जाना बंद कर दिया।

भ्रम है कि उल्लू के साथ तांत्रिक अनुष्ठान से लक्ष्मी आती है। दुश्मन को ठिकाने लगाने या वशीकरण के लिए तांत्रिक श्मशान में उल्लू की बलि देते हैं। उनका मानना है कि उसकी हड्डी से पैसा आएगा। पंजे से रोग दूर होंगे। दिवाली की रात कुछ तांत्रिक मंत्र सिद्धि के लिए उल्लू के रक्त से स्नान करते हैं। ये ऐसे अंधविश्वास हैं जिनसे उल्लू के अस्तित्व पर खतरा बन आया है।

अजीब है कि समाज में उल्लूपन की तो प्रतिष्ठा है, लेकिन साहित्य में उल्लू को हाशिये पर रखा गया है। ‘मैं कैसे मानूं बरसते नैनों कि तुमने देखा है पी को आते/ न काग बोले, न मोर नाचे, न कूकी कोयल, न चटखी कलियां...।’ यानी कवियों ने मोर, कोयल और कौवे को भी तार दिया, लेकिन उल्लू बेचारा साहित्य में जगह बनाने के लिहाज से अभागा ही रहा! मूर्ख, मूढ़, जड़मति और बुद्घिहीनता के अपमान के साथ वह जीता रहा है!

हमारे यहां वैशेषिक दर्शन के एक आचार्य हुए उलूक। उनके दर्शन को ‘औलुक्य दर्शन’ भी कहते हैं। यह न्याय दर्शन का जुड़वां है। संस्कृत कोश के मुताबिक इंद्र का एक नाम उलूक भी है। उल्लू रात के वक्त सक्रिय रहता है। इंद्र के भी रात के किस्से मशहूर हैं। देशी परंपरा उल्लू को अमंगल मानती है। ऋग्वेद के मुताबिक उल्लू और कबूतर मृत्यु के दूत हैं। उल्लू का रात में बोलना अशुभ मानते हैं। दुनिया भर में उल्लुओं की बत्तीस प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें सबसे ज्यादा बुद्घिमान उल्लू को ‘चुगधु घुग्घु’ कहते हैं। उल्लू के कई दूसरे नाम भी हैं- निशाचर, वज्रधर, कुचकुचवा, पेचकी, घर्घर, काकभीरु, कौशिक, दिवांध, निशिचर, मघवा और शक्र।

लक्ष्मी को उल्लू पसंद आने की खास वजह शायद उसका उल्लू होना ही है। ‘उल्लू जितने भी मिलें, झुक कर करो प्रणाम, उल्टे-सीधे वक्त में उल्लू आते काम, उल्लू आते काम साथ लक्ष्मी को लाएं, क्या जाने किस रूप में फिर उल्लू मिल जाएं।’

लेकिन हम तो काठ के उल्लू ठहरे। गृहलक्ष्मी को काठ का उल्लू पसंद है, जो उनकी उंगली के इशारे पर नाचता फिरे। गृहलक्ष्मी चाहती हैं कि उनका उल्लू सिर्फ उनके लिए उल्लू हो। बाकी संसार के लिए नहीं। शायद इसीलिए सिर्फ सुनने और जवाब न देने वाले उल्लुओं की बाजार में ज्यादा मांग है। अगर किसी को काठ का उल्लू कहें तो गाली मानी जाती है। उल्लू का पट्ठा कहें तो बवाल मचता है। पट्ठा शब्द जवान के लिए प्रयोग में आता है। पर उल्लू का पट्ठा वल्दियत बदल देता है। कुछ उल्लू बने होते हैं। कुछ बनाने पड़ते हैं। देखा आपने, जनता को उल्लू बना सरकार घोटाले पर घोटाले कर रही है। कुछ थोड़े से लोगों को जेल में डाल हमें फिर उल्लू बनाने की कोशिश हो रही है। और जनता उल्लू की तरह आंख फाड़ तमाशबीन है।

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