रावण जनशक्ति का शत्रु है। उसका जलाया जाना सालाना उत्सव है। पर हर साल जलाए जाने के बाद फिर से जलने के लिए पैदा होना, यही रावण होने का मतलब है। रावण के रक्तबीज चारों तरफ फैले हैं। आप जलाते जाएंगे, वह पैदा होता जाएगा। रावण प्रतीक है अधर्म, अन्याय, अहंकार और अनीति का। सामान्यजन के उत्पीड़न का। वह दशानन है। सिर अहंकार का प्रतीक है और मुंह एक साथ दस किस्म के बात की गारंटी! राम का पक्ष आम जन का पक्ष है और रावण अनियंत्रित बेकाबू सत्ता पर सवार शासक। रावण कालजयी है, रथी है। उससे युद्धरत रघुवीर पैदल।
तब की तरह आज भी यह परंपरा रथी है। रथी और विरथ की यह सर्वव्यापी लड़ाई युगों से जारी है। तब से इस प्रवृत्ति से बार-बार लड़ता आम आदमी हर काल में विरथ रहा है। यानी रावण रथ पर और जनता पैदल है। रावण तंत्र पर काबिज है जनता जूझ रही है। रावण नीति-निर्माता है, जनता उसे भुगतती है। यह लड़ाई अनंत है।
रथी और विरथ का यह द्वंद्व प्रतीक है ताकत और सत्ता बनाम मानव मूल्यों के संघर्ष का। रावण की फौज को देख विभीषण अधीर होते हैं। तुलसीदास कहते हैं-‘रावण रथी विरथ रघुवीरा, देख विभीषण भयउ अधीरा।’ विभीषण की चिंता सत्ता के कुटिल औजारों से है। राम निरपेक्ष भाव से उन्हें भरोसा देते हैं- ‘हम सत्य, शील, शौर्य, धैर्य, बल, विवेक, परोपकार, क्षमा, दया के रथ पर सवार हैं।’ राम का पक्ष मानव मूल्यों का है। इसलिए वे अपनी सीमाएं जानते हैं। विभीषण की नजर साध्य की तरफ है। राम की साधन की ओर। साधन जिसके पवित्र होंगे, जीत उसकी होगी। यही पक्ष गांधी का भी था।
समय बदला है। रावण सत्ता से निकल उदारीकरण और एफडीआइ के जरिए बाजार और तंत्र में भी घुस गया है। वह अब ‘भूमंडलीकरण’ के रथ पर सवार है। उससे कैसे निपटा जाए? यह दुविधा सिर्फ हमारी धार्मिक परंपरा में नहीं, आज की राजनीति में भी दिखती है। डॉ लोहिया ने कहा था- ‘धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म।’ राम की जीत अधर्म पर धर्म की जीत थी। सच जीता था। रावण हारा था। हमारे यहां तो कहा ही गया है- ‘सत्यमेव जयते।’ भारत ने इसे अपना राष्ट्रीय प्रतीक बनाया है। मानते हैं कि सत्य की सदा विजय होती है। यह हमारी आकांक्षा भी है। मगर ऐसा होता नहीं। यह यूटोपिया है। आज तथ्य उलटा है। दरअसल, जिसकी जीत होती है, उसे ही लोग सत्य कहते हैं। चिकमंगलूर उपचुनाव में इंदिरा गांधी के मुकाबले जनता पार्टी के वीरेंद्र पाटिल उम्मीदवार थे। दोनों अलग-अलग शृंगेरी के शंकराचार्य से मिले। उन्होंने दोनों को विजयी होने का आशीर्वाद दिया। लोगों ने पूछा कि आपने दोनों को जीतने का आशीर्वाद दिया है, यह कैसे हो सकता है। शंकराचार्य बोले- ‘सत्यमेव जयते।’ यानी हारना पाप है, जीतना पुण्य है। युगों से रावणी प्रवृत्ति से लड़ते लोगों के लिए राम उम्मीद की एक किरण हैं। इसलिए वे राम के पक्ष में खड़े होकर रावण का पुतला जलाते हैं।
रथी परंपरा के वाहक मौजूदा राजनीतिक ढांचे में भी हैं। आम जन के खिलाफ यह ढांचा उसी रथी परंपरा के साथ खड़ा नजर आता है। यह मुट्ठी भर लोगों को पूरे देश का नियंत्रण देने के लिए बनाया गया है। नतीजतन, सारी ताकत सत्ता के छोटे केंद्र में सिमटती गई। चौंसठ बरस के सत्ता के सफर का मकसद यही रहा कि कहीं कोई ऐसा व्यक्ति न पैदा हो जाए जो हमसे ताकतवर दिखे। इसी प्रवृत्ति ने रावण को जिलाए रखा है। हम पुतला जलाते जाएंगे। वह जीवन पाता रहेगा।
रावण अद्भुत विद्वान था। सभी शास्त्रों का ज्ञाता। वह महान ऋषि पुलत्स्य का पौत्र और विश्वश्रवा का पुत्र था। अपने समय के महान वास्तुकार मय का जामाता था। फिर अधर्म का प्रतीक क्यों माना गया? क्योंकि वह अमर्यादित और अहंकारी था। खुद ईमानदारी का चोगा ओढ़ बेइमानों का सरगना था। सत्ता के दंभ में चूर विधान से ऊपर था। अलोकतांत्रिक था, इसलिए अधर्मी माना गया। क्या आज के रथी परंपरा के वाहक इनमें से ढेर सारे गुणों से लैस नहीं दिखते? इस परंपरा की ही मजबूरी है इन बुराइयों से घिरना। इसलिए रावण जीवित है।
दूसरी ओर राम ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ हैं। उनकी ताकत, आचरण, व्यवहार मर्यादा के दायरे में है। धोबी का आरोप हो या पिता का आदेश, राम ने कभी नियमों को नहीं तोड़ा। वे चाहते तो अपने हक में संविधान संशोधन कर सकते थे। वे चाहते तो राज छोड़ सीता के साथ रह सकते थे।
रावण मिथ नहीं, प्रवृत्ति है और उससे लड़ना आम आदमी की नियति है। आम आदमी बिल्कुल निहत्था, पैदल है रावण और उसकी पूरी सेना के सामने। काम भस्म होने के बाद अनंग होकर हममें जीवित है। लगता है रावण भी अनंग होकर हममें जीवित है। कवि की भी यही चिंता है- ‘जन-जन रावण, घर-घर लंका। इतने राम कहां ले लाऊं।’
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