मेरे मित्र चौबे जी बार-बार कहते हैं, कबीरचौरा आपसे छूट नहीं रहा है। आप भले दिल्ली में रहते हों, पर सोच के दायरे से कबीरचौरा नहीं निकल पा रहा है। वह आपके पीछे बुरी लत-सा पड़ा है। अब मेरे लिए लाख टके का सवाल है: कैसे छूटे कबीरचौरा! क्योंकि कबीरचौरा का छूटना गंगा-जमनी तहजीब का छूटना है। कबीरचौरा से हटना सांप्रदायिक सद्भाव के एक हजार साल पुराने इतिहास से कटना है। कबीरचौरा से पीछा छुड़ाना लुकाठी हाथ में लेकर सच कहने की ‘कबीरी परंपरा’ से मुंह मोड़ना है। कबीरचौरा को छोड़ना ठुमरी, दादरा, कथक और तबले की विरासत को छोड़ना है। साहित्य और संगीत की अनंत परंपरा को अंगूठा दिखाना है।
बनारस का कबीरचौरा महज एक मुहल्ला नहीं, समूची संस्कृति है। जाति-धर्म से परे। यहां पांच सौ साल पहले कबीर चादर बुनते-बुनते आधुनिक समाज का ताना-बाना रच गए थे। उसके व्यवहार और विचार के सिद्धांत गढ़ गए थे। पौराणिक बनारस में नरहरिपुरा मुहल्ला हिरण्यकश्यप का विनाश करने वाले भगवान नृसिंह के नाम पर था। कबीर के दत्तक पिता नीरू यहीं रहते थे। सो, यह स्थान कबीर की कर्मभूमि और साधना स्थली बना। कबीर की आंखिन देखी का चश्मदीद हुआ कबीरचौरा। मृत्यु के बाद यहीं उनकी समाधि बनी और कबीर मठ अस्तित्व में आया। कालांतर में यही नरहरिपुरा ‘कबीरचौरा’ के नाम से जाना जाने लगा। कबीरचौरा देश में ‘सेक्युलरिज्म’ का ‘न्यूक्लियस’, यानी केंद्र बना।
मेरा बचपन इसी मुहल्ले में बीता। घर से कोई दो सौ मीटर की दूरी पर थी औघड़नाथ की तकिया। अघोरी साधुओं की धूनी। आंखें लाल-लाल किए डरावने साधू। यहीं अनहद की बानी कबीर ने सुनी थी। कबीर हर रोज औघड़नाथ तकिया आते थे। अलग-अलग संतों के क्रियाकलाप उनकी उत्सुकता के केंद्र थे। इसी तकिया से बुनकर कबीर के संत कबीर बनने की प्रक्रिया शुरू हुई। यहीं उन्होंने हिंदू-मुसलमान के आडंबर को पहचाना और धर्म के पाखंड के खिलाफ शंखनाद किया। जीवन-जगत को जाना। उन्हीं के शब्दों में ‘ना कछु किया न करि सका, न करने जोग शरीर। जो कछु किया सो हरि किया, भये कबीर कबीर।’ तो मित्रो, यहीं कबीर, कबीर हुए। कबीर यानी सबसे बड़ा। बहरहाल, समाज की सारी अवैधताओं पर चोट करने का केंद्र कबीरचौरा बना!
कबीरचौरा भक्ति के साथ रस भी बरसाता है। पंडित कंठे महाराज से लेकर किशन महाराज और गोदई महाराज तक तबले की समृद्ध परंपरा। गिरिजा देवी की ठुमरी हो या सितारा देवी और गोपीकृष्ण के नृत्य की ताल। हनुमान प्रसाद मिश्र की सारंगी हो या फिर पंडित राम सहाय, राजन-साजन मिश्र का गायन। सबकी जड़ें इसी कबीरचौरा में हैं। यह कबीरचौरा प्रसाद, प्रेमचंद और रामचंद्र शुक्ल का है तो देवकीनंदन खत्री, ठाकुर प्रसाद सिंह, हजारी प्रसाद द्विवेदी, मनु शर्मा, नामवर सिंह, शिवप्रसाद सिंह, मंगला गौरी मंदिर में शहनाई बजाते बिस्मिल्लाह खां, कीनाराम, लाहड़ी महाशय और तैलंग स्वामी का भी। कबीर ने इस समाज को जाना था, तुलसी ने माना था। कबीरचौरा दोनों का है।
यह इतिहास से बाहर भूगोल से परे है। परंपरा को जीता और आधुनिकता को ओढ़ता-बिछाता। यहां न कोई व्यस्त है न ‘वर्कलोड’ से ग्रस्त। कुछ करने की वासना नहीं! होने का सौंदर्य है। मस्ती ऐसी कि गंगा नहाने और जूता सिलने में यहां के समाज में कोई फर्क नहीं है। दुनिया को ठेंगे पर रखना इसका स्वभाव है। फक्कड़पन विशिष्टता। लिंग पूजा सांस्कृतिक विरासत है। लुकाठी हाथ में लेकर अपना घर फूंकने की तत्परता इसकी प्रकृति है। इसी कबीरचौरा में कबीर ने सधुक्कड़ी (बोल-चाल की हिंदी) भाषा गढ़ी, जिसे बाद में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी भाषा के संस्कार दिए और तुलसी ने देवभाषा के समांतर लोक भाषा खड़ी की।
डॉ लोहिया ने तो ‘सुधरो और टूटो’ का नारा बीसवीं शताब्दी में दिया था। कबीर अपने वक्त में ‘सुधरो या टूटो’ की मुनादी कर रहे थे। वे सुधार चाहते थे भले व्यवस्था टूट जाए। तब कबीरचौरा ने मोटी-मोटी पोथियों के अस्तित्व को नकारा था। किताबी ज्ञान के बरक्स सिर्फ ढाई आखर प्रेम की पढ़ने की जरूरत बताई थी। जब लोकतांत्रिक समाज बना भी नहीं था, तब इस मुहल्ले ने आलोचना को सर्वोपरि माना था। कबीरचौरा का एलान था- ‘निंदक नियरे रखिए आंगन कुटी छवाय।’ भले इस विकसित लोकतंत्र में अब किसी को आलोचना बर्दाश्त नहीं है। कबीरचौरा यानी कर्मकार, मेहनतकश लोगों का मुख्यालय, जिनका मानना है कि जो अपने भीतर है उसे व्यर्थ ही लोग मंदिर, मस्जिद, काबा, कैलाश में ढूंढ़ते हैं।
मार्क्स से चार शताब्दी पहले कबीरचौरा का साम्यवाद देखिए- ‘सार्इं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाए। मैं भी भूखा ना रहूं, साधू न भूखा जाए।’ मांग और आपूर्ति पर यह ‘फतवा’ मार्क्स से चार सौ साल पहले कबीरचौरा का था। मांगने में भी साम्यवाद! अस्तेय और अपरिग्रह का समाज। तब से कबीरचौरा को समझने की कोशिश जारी है। जिसकी जैसी समझ, उसका वैसा कबीरचौरा। समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, समानता, सद्भाव के साथ-साथ पाखंड या आडंबर के खिलाफ बीज तत्त्व कबीरचौरा में मौजूद है। कुंठित होता समाज कबीरचौरा के यथार्थ को नहीं समझ सकता। इसलिए बार-बार कबीरचौरा की ओर लौटता हूं। इसे भूलना मुश्किल है।
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