हिसार में कांग्रेस अपनी वजह से हारी है। पर उसकी जमानत अन्ना ने जब्त कराई है। अन्ना के ‘कांग्रेस हराओ" /> हिसार में कांग्रेस अपनी वजह से हारी है। पर उसकी जमानत अन्ना ने जब्त कराई है। अन्ना के ‘कांग्रेस हराओ" /> हिसार में कांग्रेस अपनी वजह से हारी है। पर उसकी जमानत अन्ना ने जब्त कराई है। अन्ना के ‘कांग्रेस हराओ" />
हिसार में कांग्रेस अपनी वजह से हारी है। पर उसकी जमानत अन्ना ने जब्त कराई है। अन्ना के ‘कांग्रेस हराओ’ अपील से हिसार में बदलाव की आंधी उठी है। बदलाव की यह हवा ठीक वैसी ही है जैसी 1974 में जबलपुर और 1989 में इलाहाबाद उपचुनाव से उठी थी। हिसार का नतीजा भ्रष्टाचारी राज के अंत की शुरूआत है। अब बदलाव का यह सिलसिला उत्तर प्रदेश से होता हुआ आम चुनाव तक जाएगा। यही हिसार का सार है।
क्या हिसार जबलपुर और इलाहाबाद उपचुनाव की तरह केंद्र में सत्ता परिवर्तन का वाहक बनेगा? जबलपुर में तब जे.पी. की अपील पर जनता ने कांग्रेस की नींव खोदी थी। तब सेठ गोविंद दास के पोते रविमोहन सेठ को एक मामूली युवा नेता शरद यादव ने हराया था। वहीं से सत्ता परिवर्तन की जो आंधी चली तो 1977 में इंदिरा गांधी सरकार का सूपड़ा साफ हुआ।उस एक उपचुनाव ने देश का माहौल बदल दिया। जबलपुर कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी एका की धुरी बना।
फिर 1989 में इतिहास ने खुद को दुहराया इलाहाबाद के उपचुनाव में। यह उपचुनाव भी केंद्र में सत्ता परिवर्तन का कारण बना। बोफोर्स के भ्रष्टाचार के खिलाफ विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस हराओ का नारा दिया। विपक्ष वी.पी.सिंह के पीछे एकजुट था। उपचुनाव में कांग्रेस की जमानत जब्त हुई। इस उपचुनाव से उठी कांग्रेस विरोधी हवा को तबके प्रधानमंत्री राजीव गांधी नहीं थाम सके। 1989 में सरकार चली गई। गैर कांग्रेसी राज आया। दो दफा देश में कांग्रेस का जाना उपचुनावों ने तय किया। अब इसकी शुरूआत हिसार से हो रही है।
हिसार से जीते कुलदीप बिश्नोई भले ये कहें कि अन्ना से उन्हे कोई फायदा नहीं हुआ है। पर उन्हे ये मानना चाहिए कि उनके पिता भजनलाल के मुकाबले में भी कांग्रेस ने पिछले चुनाव में 25 फीसदी वोट पाए थे। तब 10 प्रतिशत वोट बसपा को भी मिले थे। इस बार बसपा नहीं लड़ी। बसपा को मिलने वाले दलित वोट हरियाणा में कांग्रेस के होते हैं। ऐसे में कांग्रेस के वोट 35 फीसदी बैठते हैं। पर कांग्रेस को मिले सिर्फ 16 प्रतिशत वोट। तो महाराज बिश्नोई जी, यह है अन्ना का असर। दूसरी बार कुलदीप बिश्नोई को शहरी इलाकों में ज्यादा बढ़त मिली। इस वक्त शहरी मध्यवर्ग ज्यादा अन्ना के असर में है। यह सही है कि अन्ना की ‘कांग्रेस हराओ’ अपील से पहले भी हिसार में कांग्रेस पिछड़ रही थी। पर कांग्रेस की जमानत जब्ती अन्ना का असर है। इसे अगर कांग्रेस माने तो उसे अपनी दुर्दशा के कारण ढूंढने में आसानी होगी।
वैसे भी ‘असारे अस्मिन हिसारे’ के जो निहितार्थ है वे कांग्रेस के लिए भयावह है। इतने भयावह कि अब राहुल गांधी को भी झकमार कर अन्ना से नहीं उनके सरपंच से बात करनी पड़ रही है। वही अन्ना जो अब तक कांग्रेस की नजरों में पागल, बेईमान और आर.एस.एस. के एजेन्ट थे। स्थिति यह हुई कि कांग्रेस के युवराज अब उन्हीं अन्ना के सरपंच से बात करेगें। ये हैं हमारे जनतंत्र के नए प्रतीक।
इस नतीजे से लापरवाह कांग्रेस यह खुशफहमी पाल सकती है कि आम चुनाव अभी दूर है तब तक घर संभाल लिया जाएगा। पर साख खो चुकी सरकार को अब हिसार का जनादेश चारों ओर से घेरेगा। यह जनादेश विपक्षी बिखराव को रोकेगा। हिसार 1974 और 1989 की तरह विपक्षी एका की धुरी भी बन सकता है। हां हिसार के अन्ना इफेक्ट से मुख्यमंत्री भूपिन्दर हुड्डा को राहत जरुर मिलेगी। अन्ना से पहले भी कांग्रेस यहां हार रही थी। अब उन्हें सोनिया गांधी को यह सफाई का बहाना मिलेगा कि मैं क्या करता। टीम अन्ना ने खेल बिगाड़ा है। चुनाव में हार और वोटों की गिरावट की वजह अन्ना हैं। हरियाणा सरकार का कामकाज नहीं।
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