गौरैया, अम्मा और आंगन। ये मेरे बचपन की यादें हैं। अम्मा रही नहीं और अब घरों में आंगन भी नहीं रहे। इसलिए गौरैया भी घर में नहीं आती। वे यादें छिन गर्इं जिन्हें लेकर मैं बड़ा हुआ था। जीवन में चहकने और फुदकने के मायने हमने गौरैया से सीखे थे। प्रकृति से पहला नाता भी उसी के जरिए बना था। अब ऊंचे होते मकान, सिकुड़ते खेत, कटते पेड़, सूखते तालाब और फैलते मोबाइल टावरों ने प्यारी गौरैया को हमसे छीन लिया है।
पिछले दिनों गौरैया को दिल्ली का राज्य-पक्षी घोषित किया गया। यह याद करना मुश्किल है कि गौरैया को आखिरी बार मैंने कब देखा था। पक्षी विज्ञानियों की मानें तो गौरैया विलुप्ति की ओर है। इसी चंचल, शोख और खुशमिजाज गौरैया का घोंसला घरों में शुभ माना जाता था। इसके नन्हे बच्चे की किलकारी उस घर की खुशी और संपन्नता का प्रतीक होती थी। हमारे घरों में छोटे बच्चों का पहला परिचय जिस पक्षी से होता था, वह गौरैया ही थी। उसके बाद कौवे से पहचान होती थी। सुनते हैं मेहमान के आने का संदेश देने वाले काग पर भी खतरा है। कौवे भी गायब हो रहे हैं।
मां अक्सर गौरैया के सहारे ही रोते बच्चों को चुप कराती थी। सुबह की नींद गौरैयों की चहक के साथ टूटती थी। मैं अपने आंगन में हर रोज गौरैया को पकड़ने की विफल चेष्टा के साथ ही बड़ा हुआ। कोई पंद्रह सेंटीमीटर लंबी इस फुदकने वाली चिड़िया को पूरी दुनिया में घरेलू चिड़िया मानते हैं। सामूहिकता में इसका भरोसा है और यह आमतौर पर झुंड में रहती है। मनुष्यों की बस्ती के आसपास घोंसला बनाती है। आज के सजावटी पेड़ों पर इसके घोंसले नहीं होते। इस लिहाज से यह घोर समाजवादी है! दाना चुगती है। साफ -सुथरी जगह पर रहती है। लेकिन हर वातावरण में खुद को ढाल लेने वाली यह चिड़िया अब हमारे बिगड़ते पर्यावरण का दबाव नहीं झेल पा रही है। जीवनशैली में आए बदलाव ने इसका जीना मुहाल कर दिया है। लुप्त होती इस प्रजाति को ‘रेड लिस्ट’ यानी खतरे की सूची में डाला गया है।
गौरैया हमारी आधुनिकता की बलि है। चालीस बरस पहले जब मेरे घर में छत से लटकने वाला पहला पंखा आया, तो बड़ी खुशी हुई। लगा कि मौसम पर विजय मिली! उसी कमरे के रोशनदान में नन्ही गौरैया का एक छोटा परिवार रहता था। एक रोज गौरैया पंखे से टकरा कर कट गई। इस तरह मासूम गौरैया घर आई आधुनिकता की पहली भेंट चढ़ी। पंखा तो नहीं हट सकता था, सो हमने इंतजाम किया कि गौरैया रोशनदान में न रहे। मेरी मां घर में ही अनाज धोती-सुखाती थी। आंगन में चावल के टूटे दाने गौरैया के लिए डाले जाते थे। गौरैया का झुंड पौ फटते ही आता था। चूं-चूं का उनका सामूहिक संगीत घर में जीवन की ऊर्जा भरता था। अब घर में आंगन नहीं है। पैकेट में बंद अनाज आता है। वातानुकूलन के चलते रोशनदान नहीं है। इसीलिए गौरैया रूठ गई है। वह नहीं आती।
गौरैया समझदार और संवेदनशील चिड़िया है। बच्चों से इसका अपनापा है। रसोई तक आकर चावल का दाना ले जाती है। घर में ही घोंसला बना कर परिवार के साथ रहना चाहती है। मौसम की जानकार है। कवि घाघ और भड्डरी की मानें तो अगर गौरैया ‘धूल स्नान’ करे तो समझिए कि भारी बरसात होने वाली है। तो फिर आखिर क्यों रूठ गई गौरैया? तमाम लोकगीतों, लोककथाओं और आख्यानों में जिस पक्षी का सबसे ज्यादा वर्णन मिलता है, वह गौरैया है। महादेवी वर्मा की एक कहानी का नाम ही है ‘गौरैया।’ उड़ती चिड़िया को पहचानने वाले पक्षी विशेषज्ञ सालिम अली ने अपनी आत्मकथा का नाम ‘एक गौरैया का गिरना’ रखा है। कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी आत्मकथा ‘नीड़ का निर्माण फिर’ में गौरैया के हवाले से अपनी बात कही है। शेक्सपियर के नाटक ‘हेमलेट’ में भी एक पात्र अपनी बात कहने के लिए गौरैया को जरिया बनाता है। मशहूर शिकारी जिम कार्बेट कालाडूंगी के अपने घर पर रोज हजारों गौरैयों के साथ रहते थे।
देश के अलग-अलग इलाके में जाने पर बोली-भाषा, खान-पान, रस्म-रिवाज सब बदलते जाते हैं, गौरैया नहीं बदलती। हिंदी पट्टी की गौरैया तमिल और मलयालम ‘कुरूवी’ बन जाती है। तेलुगू में इसे ‘पिच्यूका’ और कन्नड़ में ‘गुव्वाच्ची’ कहते हैं। गुजराती में यह ‘चकली’ और मराठी में ‘चीमानी’ हो जाती है। गौरैया को पंजाबी में ‘चिड़ी’, बांग्ला में ‘चराई पाखी’ और उड़िया में ‘घट चिरिया’ कहते हैं। सिंधी में इसे ‘झिरकी’ उर्दू में ‘चिड़िया’ कश्मीरी में ‘चेर’ के नाम से बुलाते हैं।
जैव विविधता पर लगातार बढ़ते संकट से न सरकार अनजान है, न समाज। फिर गौरैया कैसे बचे? हम क्या करें? वह सिर्फ यादों में चहकती है। अतीत के झुरमुट से झांकती है। क्यों यह समाज नन्ही गौरैया के लिए बेगाना हो गया है? इसे अपने आंगन में हमें वापस बुलाना होगा। नहीं तो हम आने वाली पीढ़ी को कैसे बताएंगे कि गौरैया क्या थी! उसे नहीं सुना पाएंगे- ‘चूं चूं करती आई चिड़िया... दाल का दाना लाई चिड़िया!’
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