एक और मातृनवमी बीत गई। फिर मैंने अपनी मां का श्राद्ध नहीं किया। क्योंकि मैं नहीं मानता कि वे मेरे साथ नहीं है। मृत्यु सिर्फ देहावसान है। आत्मा तो अमर है। बीस बरस हुए अम्मा को गुज़रे। पर हर वक्त हर दिन वो मेरे साथ रही हैं। खुशी-गम, अच्छे-बुरे, सबमें। मेरा मानना है, मेरी रगों में उनका ही खून बहता है। मेरी उंगलियों में उनके ही स्पर्श का आभास सांस लेता है। उन्होंने खुद को खोकर मुझमें एक नया आकार लिया है। इसलिए मैं पितृपक्ष में अम्मा का श्राद्ध और तर्पण नहीं करता। श्राद्ध पितरों के ऋण से उऋण होने के लिए है। क्या मां जैसी अलौकिक शक्ति का सिर्फ एक रोज़ तर्पण कर हम उसके अनंत कर्ज को चुका सकते हैं। मां के विशाल व्यक्तित्व के आगे बौना है यह कर्मकांड। मेरे जीवन में तीन सौ पैंसठ दिन जो घटित होता है! उसके पीछे मां ही है। वह हमेशा मेरे साथ रहती है। फिर मैं यह सब क्यूं करुं !
मेरी मां बहुत पढ़ी लिखी नहीं थी। आधुनिकता और संपन्नता से भी उनका सीधा साक्षात्कार नहीं हुआ था। बावजूद इसके कभी जीवन से असंतुष्ट नहीं दिखीं। जब भी मैं मोमबत्ती को पिघल कर रोशनी देते हुए देखता हूं। अम्मा याद आती है। खुद को खोकर हमें बड़ा करते हुए दिखती है। चोट किसी को लगे दर्द उसे होता ही होता था। पिता की लम्बी उम्र के लिए बरगद की परिक्रमा में उसके पांव कभी नहीं थके। अपने बच्चों की सलामती के लिए अहोई अष्टमी हो या गणेश चौथ का व्रत, इन्हें रखने में वह कभी नहीं उकताई थी। आधी सोई, आधी जागी, थकी रात में कभी किसी को कम्बल उढ़ाती तो किसी का तकिया ठीक करती। सुबह जब हम सोकर उठते तो झकाझक धुले हमारे कपड़े आंगन में सूख रहे होते। चूल्हा धुआं उगल रहा होता, चाय का पानी अंगीठी पर चढ़ा होता। फिर रसोई से ही पूरे घर को कंट्रोल करती अम्मा। किसका सामान कहां है? कौन क्या पहनेगा? क्या खायेगा! क्या ले जायेगा! एक अम्मा। हज़ार जहमत। फिर भी परम संतुष्ट।
घर में इतने लोग होते थे पर संयुक्त परिवार के रिश्तो की बारीकियां सिर्फ वही समझती थी। गलती किसी की हो सारा गरल वह अपने गले में रखती थी। परिवार में कैसे भी झगड़े हों वो दूसरों के गुनाहों को धो देती थी। बहुत गुस्सा होती तो रो देती थी। कवि आलोक ने ठीक ही कहा है "घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे। चुपके-चुपके कर देती थी जाने कब तुरपाई अम्मा।” उनके न रहने पर रिश्ते उधड़े । तार-तार हुए। तभी लगा अम्मा अब नहीं है।
मन में ढेर सारी इच्छाएं, सपने दबाए अम्मा एक रोज़ अचानक चली गई। आज आधुनिकता के ये साजो सामान मेरे किस काम के! अम्मा ने तो उसे भोगा ही नहीं। हमने हड़बड़ी न दिखाई होती तो शायद थोड़ा वक़्त वो और साथ रहती। उनके दिल के वाल्व ख़राब हो गए थे। इसलिए उनका दिल असमान्य धड़कता था। डॉक्टरों का कहना था ऑपरेशन हुआ तो ज़्यादा समय के लिए दिल ठीक रह सकता है। नहीं हुआ तो पांच-सात साल से ज़्यादा नहीं हैं। हमने ऑपरेशन करा दिया। वह नहीं चाहती थीं। उनसे यह झेला नहीं गया। वह चली गई। हमारे लिए तो वे स्नेह, त्याग, उदारता, सहनशीलता के प्रतिमान गढ़ती थी। खुद का सवाल होता तो दर्द को पी लेती थी।
मेरे जन्म के वक़्त भयानक बरसात हो रही थी। पानी रुकने का नाम नहीं ले रहा था। “घन घमंड नभ गर्जत घोरा।” कच्चे घर के टूटे छप्पर से जगह-जगह पानी चू रहा था। पूरी रात मेरी मां इस जुगाड़ में मुझे चारपाई पर इधर से उधर हटाती बढ़ाती रही कि टपकते पानी से मैं कहीं भीग ना जाऊं। पानी रोकने के लिए कहीं थाली रखी गई कहीं बाल्टी। प्रसव पीड़ा के वाबजूद बच्चे के प्रति इस हद तक आसक्ति का भाव। यही है मां।
कच्चा घर और टूटी छप्पर तो मेरे जन्म के साथ जाते रहे। पर नहीं गया तो अम्मा का स्नेह। जिसका स्नेहिल स्पर्श आज भी मैं जब मुश्किल में होता हूं। उसे महसूस करता हूं। अब न मेरे मकान में छप्पर है। न पानी टपकने कि कोई गुंजाइश। मौसम को नियंत्रित करने के सभी उपकरण भी हैं। नहीं हैं तो अम्मा। होती तो बहुत खुश होती। ‘वह आज जहां भी होगी । इसी चिन्ता में लगी होगी कि उसके बेटे को तकलीफ न हो। उसकी इसी इच्छाशक्ति ने उसे जीवित रखा है’।
इसीलिए अपना मानना है वह जिंदा है। निदा फाजली के शब्द उधार लूं तो ‘तुम्हारी मौत की सच्ची खबर जिसने उड़ाई है वह झूठा था/ कोई सूखा हुआ पत्ता हवा से गिरके टूटा था/ वह तुम कब थी/ ....मैं तुझमें कैद हूं/ ....तुम मुझमें जिंदा हो।’
ये सही है कि अपने-अपने दर्द होते हैं। लेकिन दर्द सहने का मापक यंत्र मां ही होती है। मनुष्य के शरीर में अधिकतम पैंतालीस डेल (दर्द नापने की इकाई) दर्द सहने की क्षमता होती है। प्रसव के वक्त यह दर्द सत्तावन डेल तक पहुंच जाता है। इतना दर्द बीस हड्डियों के एक साथ टूटने जितना होता है। हमें दुनिया दिखाने के लिए मां को कितना दर्द सहना पड़ता है! पौराणिक कथा है। नारद ने ब्रह्मा से पूछा कि आप क्या बना रहे हैं। ब्रह्मा का जवाब था- मां बना रहा हूं। नारद ने फिर पूछा कि मां कैसे बनती है। ब्रह्मा ने कहा कि जिसकी कोख से इंसानियत जन्मती हो, जिसकी गोद में दुनिया समा जाए, जो बच्चे की आवाज से उसकी परेशानी जान जाए, जिसकी संतान परदेश में रोए आंचल देश में भीगे, लाख तकलीफों के बावजूद जिसके दिल से दुआ निकले, जिसके मन में जमाने भर का दर्द समा जाए और अधरों पर आह न आए। मां ऐसे बनती है। मां ऐसी होती है।
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