पंद्रह अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री जिस जादू की छड़ी को ढूंढ रहे थे। वो चल गई। फर्क इतना कि छड़ी प्रधानमंत्री ने नहीं जनता ने चलाई। 73 साल के एक निहत्थे बूढे़ ने छड़ी चलाई और इतिहास बन गया। जीत जनता की हुई। हम भारत के लोग जीते। एक बार फिर दुनिया ने अहिंसा की ताकत देखी। अन्ना ने देश को ही नहीं दुनिया को फिर गांधी का रास्ता दिखाया।
संसद की गरिमा घटी नहीं। सरकार की नाक जरुर नीची हुई। सड़कों पर आए जनसैलाब से खतरा सरकार के सिर और नाक दोनों पर था। सिर बचाने के लिए सरकार ने नाक नीची करने का फैसला लिया। ऐसा मजबूरन करना पड़ा। अंतिम वक्त तक सरकार अन्ना के साथ सांप-सीढ़ी का खेल खेल रही थी। सरकार ने अन्ना को थकाना चाहा पर संसद में खुद थक हारकर बैठी।
भ्रष्टतंत्र के खिलाफ यह जनतंत्र की जीत नहीं है। जंग का पहला पड़ाव है। रामलीला मैदान से परिवर्तन की लड़ाई छिड़ी है। यह कहां तक जाएगी पता नहीं। संयोग ये है कि 77 में भी निरकुंश सत्ता के खिलाफ लड़ाई इसी रामलीला मैदान से शुरु हुई थी। अन्ना ने संकेत दिया है कि यह लड़ाई ‘राइट टू रीकॉल’ और ‘राइट टू रीजेक्ट’ तक जायेगी। नेता चुनने के बाद जनता अब पांच साल तक हाथ पर हाथ धर नहीं बैठेगी। अगर संसद जन आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरती तो नेताओं को वापस बुलाने का अधिकार भी जनता के पास होगा। राजनीतिक जमात सावधान! लोगों को अपनी ताकत का अहसास हो गया है।
अन्ना के आंदोलन के निहितार्थ है। अगर नेतृत्व ईमानदार है। लोगों का भरोसा है तो बिना हिंसा के भी बदलाव संभव है। सत्ता के दंभ ने इस आंदोलन को पलीता लगाया। यह आंदोलन सरकार को सिखा गया कि वाणी पर संयम जरुरी है। राजनीतिक जमात को सिखाया कि राजनीति जनता के साथ नहीं हो सकती। वरन् जनता के मुद्दों पर आम राय बनाई जाए। अन्ना अब व्यक्ति नहीं बल्कि अहिंसा के जरिए परिवर्तन के प्रतीक बन चुके हैं। गांधी ने अहिंसा के जरिए 20 वीं सदी में दुनिया को हिलाया था। अन्ना ने 21वीं सदी में उस वक़्त शांतिपूर्ण आंदोलन की धार तेज़ की है जब दुनिया में सशक्त क्रांतियों का दौर है। देश के माओवादियों को भी इस आंदोलन से सबक लेना चाहिए।
यह अन्ना का करिश्माई नेतृत्व था जिसने 12 दिनों तक लाखों लोगों को अहिंसक बनाए रखा। अन्ना के पास न संगठन है न कार्यकर्ता। केवल उनके व्यक्तित्व के कारण ही समूचा देश उनके पीछे खड़ा था। सरकार को अन्ना की ताकत के बढ़ने और देश में ऐसी लहर उठने की उम्मीद नहीं थी। इसलिए पहले अन्ना को अपमानित किया गया। फिर जेल में डाला गया। फिर प्रधानमंत्री अन्ना को सेल्यूट करने लगे और संसद ने उनका प्रशस्ति-गान किया। बार बार सरकार का रुख इसलिए बदला क्योंकि जनता की नब्ज़ पर सरकार का हाथ नहीं था।
भ्रष्टाचार का बारुद देश में पहले से ही फैला था। नौजवान उससे परेशान था। अन्ना ने केवल दिशा दी और नौजवान सड़क पर था। राजनीतिक दल असहाय लगे। जब तक अनशन चला हर दिन सरकार की किरकिरी होती गई। भाजपा की नीयत भी ठीक नहीं थी। सरकार खुद तो दुविधा में थी और आंदोलनकारियों से भी दोहरी बात कर रही थी। जब देश में अन्ना पर बवाल था उस रोज़ सुषमा स्वराज का महंगाई पर कार्यस्थगन का नोटिस था। भाजपा तब जगी जब नागपुर से डंडा चला। आनन-फानन में गडकरी ने अन्ना को चिट्ठी लिखी। चिट्ठी लेकर जब भाजपा नेता अन्ना के पास पहुंचे तो अन्ना ने कहा चिट्ठी में जो लिखा है संसद में तो ऐसी भूमिका नहीं है आपकी। भाजपा ने रातों-रात रवैया बदला। लेकिन तब तक पार्टी एक्सपोज़ हो चुकी थी।
जनवादी कवि धूमिल ने कहा था- तीन घिसे पिटे रंगों को/ एक घराऊँ पहिया ढोता है/ क्या इससे भी अधिक आज़ादी का मतलब/ हमारे लिए कुछ होता है। धूमिल होते तो तिरंगे की ताक़त देखते। पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ तिरंगे का जज़्बा। जिसने राजनीतिक जमात को हाशिए पर ढकेल दिया। अब राजनीतिक दल मीडिया को कोस रहे हैं। कहा मीडिया आंदोलन चला रहा है। मित्रों, मुद्दों से मुंह मत चुराइए। जनता की नब्ज़ पढ़िए। असलियत जानिए। अपनी आत्मा टटोलिए। राजनीति के पांव के नीचे खिसकती रेत को देखिए। मीडिया तो आईना है। अब भी वक़्त है। वरना हम सब धसेंगे।
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