आधा-अधूरा मानसून आ गया लेकिन सावन नहीं आया। न तन भीगा, न मन नहाया। न धरती की कोख से सौंधी ख़ुशबू फूटी। न मोर नाचे न कोयल कूकी। न कजरी सुनाई दी और न राग मल्हार की तान। बस, सावन के बहाने पत्नी मायके चली गईं। कुछ इस तर्ज़ पर कि ‘‘तेरी दो टकियों की नौकरी पे मेरा लाखों का सावन जाए।’’
हमारे यहां सावन में मायके जाने का रिवाज़ है। सखियों के साथ धमाल की परंपरा है लेकिन अब वो सावन तो आता ही नहीं जिसके प्राकृतिक सौंदर्य पर सारी वर्जनाएं टूटती थीं। सावन की रिमझिम में पांव फिसलते थे। इस उम्र में पांव फिसले तो क्या होगा? सावन की इन बूंदों में मिलन का उत्साह और बिछोह की वेदना दोनो बराबर उफान मारती थी। संस्कृत कवियों के अनुसार प्रेम की तमाम स्थितियों को सावन उदीप्त करता है। वह कैटेलिक ऐजंट है।
सावन संयम तोड़ता है। बादलों तक में संयम नहीं रहता। कभी भी बरस पड़ते हैं। नदियां उफनने लगती हैं। बांध तोड़ बहती हैं। प्रकृति अपने सौंदर्य के चरम पर होती है। उसका सोलह श्रृंगार दिखता है। अंतहीन हरियाली दहकती है। कवि कहता है।
“पेड़ों पर छाने लगा, रंग-बिरंगा फाग, मौसम ने छेड़ा जहाँ, रिमझिम सावन राग”।
सावनी फुहार प्रेमी जोड़ों को प्रेम रस में भिगोती है। मन की नदिया बांध लांघ बहती है।
हिन्दी फिल्मों में शायद ही कोई ऐसा भाव हो जिसे सावन से न जोड़ा गया हो। इसीलिए सिर्फ सावन पर फिल्मों में पांच सौ से ज्यादा गाने लिखे गए हैं। इस मौसम का माहौल बाधा, संकोच और वर्जना तोड़ता है। साधु संत भी इस दौरान समाज से कट ‘चौमासा’ मनाते थे। आयुर्वेद भी मानता है कि सावन में मनुष्य के भीतर रस का संचार ज्यादा होता है। तभी इस मौसम में हम शिव की पूजा करते हैं। क्योंकि शिव काम का शत्रु है। इसीलिए सावन प्रकृति और मनुष्य के रिश्तों को समझने और उसके निकट जाने का मौका भी देता है।
लेकिन अब वह सावन नहीं आता या अपनी समझ बिगड़ गयी है। न बारिश की टपकती बूंदे अब शरीर पर ‘छन्न’ से आवाज करती है। वैसे भी पचासवें साल में पहुंचते ही इस साल मैं ‘आश्रम परम्परा’ के अनुसार ‘वानप्रस्थी’ हुआ था। घर की छत के ऊपर बने एक कमरे में रहने लगा। इसलिए सावन का ‘अंधत्व’ भी अब मेरे लिए बेमानी है। पत्नी की दलील है कि आप अभी ‘वानप्रस्थी’ नहीं हो सकते क्योंकि अगर आपकी ही मानी जाए तो गृहस्थ आश्रम आपने 27 वें बरस में शुरु किया था। इसीलिए अब वानप्रस्थ 52 से आरंभ होगा। तो मित्रों हमारे ‘वानप्रस्थ’ पर फिलहाल ‘स्टे’ है।
मात्र प्रेम और मादकता का प्रतीक नहीं है सावन। हमारे यहां सावन से समाज और अर्थशास्त्र भी नियंत्रित होता था। इस मौसम पर ही पूरे साल का अर्थशास्त्र निर्भर होता था। जल प्रबंधन के सारे इंतजाम इसी दौरान होते थे। मौसम का राजा बसंत भले हो। पर वर्षा ऋतु लोक गायकों की पहली पसंद है। 'आषाढ़स्य प्रथम दिवसे' को तो कालिदास ने अमर कर ही दिया है। साल का कोई समूचा महीना उत्सव नहीं है। सावन का पूरा महीना उत्सव है। बारह महीने के ऋतुचक्र को भी वर्षा से बांधा गया है। तभी तो ऋतुचक्र को वर्ष कहा जाता है।
धार्मिक लिहाज से भी यह महीना अव्वल है। इसे ‘मासानाम् उत्तमे मासे’ कहा गया है। सावन में ही समुद्र मंथन हुआ था। शिव ने इसी महीने में विषपान किया था। इसलिए पूरा माह शिव को समर्पित है। शिव ने ‘काम’ को भस्म किया था। पर कवियों के वर्णन से तो ऐसा लगता है कि वह अनंग होकर भी इस दौरान सर्वाधिक सक्रिय रहता है।
अबकी मानसून दगा दे गया। सिर्फ हमें ही नहीं मौसम विभाग को भी। हम मानसून को ढूंढने केरल गए। केरल के पश्चिमी तट से ही मानसून इस देश में प्रवेश करता है। दक्षिण पश्चिम मानसूनी हवाएं प्राचीन काल से ही ‘नैरुत्य मारुत’ कही जाती हैं। अचरज है हम उपग्रह युग में भी बादल की चाल ढाल नहीं समझ पा रहे। बादल ने समूचे मौसम विभाग को छकाया। उसे झूठा साबित किया। बादल आए तो लेकिन दबे पांव वापस लौट गए। जीवन की क्षणभंगुरता के दर्शन को बादल से बेहतर नहीं समझा जा सकता है। मानसूनी बादल का औसत जीवन कुछ घंटों का होता है।
कालिदास का यक्ष भी इसे जानता था। वह मेघदूत से कहता है कि उसका संदेश मध्यभारत के रत्नागिरि से हिमालय की तराई में अल्कागिरि तक पहुंचाए। उसे मालूम था कि अकेला बादल इतना लम्बा सफर नहीं तय कर सकता। यक्ष के पास समाधान था। वह कहता है रास्ते में पड़ने वाली नदियों पर विश्राम करते हुए जाना। जो तथ्य वह जानता था। वह हमारा मौसम विभाग नहीं जानता। उसकी अनंत अटकलें जारी हैं।
अब सावन तो आता है। पर मन में उमंग नहीं भरता। धरती की कोख से सौंधी ख़ुशबू नहीं फूटती। न मोर नाचते हैं न कोयल कूकती है। कजरी सुनाई नहीं देती। राग मल्हार भी चमत्कार नहीं दिखलाता। सिर्फ पत्नी मायके जाती है। सावन में उत्सव बस इतना ही है।
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